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Josh Schrei helped me understand G-O-D (Generator-Operator-Destroyer) concept of the divine that is so pervasive in the Vedic tradition/experience. Quantum Theology by Diarmuid O'Murchu and Josh Schrei article compliments the spiritual implications of the new physics. Thanks so much Josh Schrei.

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Dhanyabad from Anil Kumar Cheeta

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Wednesday, March 9, 2011

What are the differences among "Dharma", "Sampradaya"(Lineage) and "Matam"(Religion)? by Vanaja Ravinair

What are the differences among "Dharma", "Sampradaya"(Lineage) and "Matam" (Religion)? by Vanaja Ravinair


Sampradaya means Tradition or Discipline of Lineage. Guru-sishya-sampradAya - The Guru-Disciple Tradition or Lineage. Dharma means 'Dharayati iti' i.e., The Dharma of Fire is Heat and Light. We cannot say it is Fire if it has no Light or Heat. Matam (Religion) in Sanskrit means just 'Opinion' and it is a Way of Living.



Dharma means - "essential quality or character, as of the cosmos or one's own nature". "dharati lokan ghriyate punyatmbhiH iti va |" "धरति लोकान ध्रियते पुण्यात्मभि: इति वा" | अर्थात " जो लोकों को धारण करता है, अथवा जो पुण्यात्माओं द्वारा धारण किया जाता है वह "धर्म" है! Something that embodies the whole universe or the Noble men that is "Dharma".



"DharaNat shreya aadshati iti dharmaH |" Something by wearing which a man makes humanity prosper, progress and finally moksha, he attains Moksha. That is Dharma.



The Dharma of human beings should be righteousness.

English word for "dharma" is "dharma".



"Ahimsa Satyam astheyam

AkAma-krodha-lobhato

bhoota-priya-hitehA cha

dharmo ayam sArva-varṇikaḥ" -(Śrīmad Bhāgavatam 11.17.21)



"Nonviolence, truthfulness, honesty, desire for the happiness and welfare of all others and freedom from lust, anger and greed constitute dharma for all members of society".



Dharma can be briefly said as "that which contains or upholds the cosmos."...Dharma is universal, it transcends race, religion, gender and even species.....



Human society, for example, is sustained and upheld by the dharma performed by its m...embers..... For example, parents protecting and maintaining children, children being obedient to parents, the king protecting the citizens, are acts of dharma that uphold and sustain society. In this context dharma has the meaning of duty.



Dharma also employs the meaning of law, religion, virtue, and ethics. These things uphold and sustain the proper functioning of human society.



"Tadrisho ayam anuprashno yatra dharmaha sudurlabaha

Dushkamha pralisankhyatum tatkenatra vysvasyathi

Prabhavarthaya bhutanam dharmapravachanam kritam

Yasyat prabhavasamyuktaha sa dharma iti nischayaha." (Mahabharatam, SHANTHI PARVA - 109-9-11)



It is most difficult to define Dharma.

Dharma has been explained to be that which helps the upliftment of living beings. Therefore, that which ensures the welfare of living beings is surely Dharma. The learned rishis have declared that which sustains is Dharma.





"Dharanat dharmamityahu dharmo dhara-yate prajaah

Yat syad dharanasamyuktam sa dharma iti nischayaha." (Mahabharata, Karna Parva — Ch. 69 Verse 58)



Dharma sustains the society

Dharma maintains the social order

Dharma ensures well being and progress of Humanity

Dharma is surely that which fulfils these objectives



In a nutshell Dharma defies dogma and thus seeks to instead align the human sharira (body), manas (mind), and atman (True Self) in harmony with nature.....



and this HARMONY is necessary for growth of any human being or a COUNTRY as a whole....



Pawan Talhan ji wrote in one of the groups

***************धर्म*****************

*****"धर्म" एवं "शास्त्र" शब्दों की व्युत्पत्ति एवं परिभाषा*****

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dhrin =धारण करना, इस धातु से "धर्म" बनाता है! "धर्म" शब्द की व्याख्य इस प्रकार है--- "धरति लोकान ध्रियते पुण्यात्मभि: इति वा"



अर्थात " जो लोकों को धारण करता है, अथवा जो पुण्यात्माओं द्वारा धारण किया जाता है वह "धर्म" है!



ऋग्वेद में " धर्म " शब्द लगभग ५६ बार आया है! वह शब्द कई स्थानों में "विशेषण" तो कई स्थानों में नाम है! ऋग्वेद में कहीं " पोषण करना" इस अर्थ में शब्द आया है, कहीं "नैतिक नियम" एवं "आचार" अर्थ में और कहीं "प्राचीन नीति-नियम" अर्थ में धर्म शब्द आया है!



अर्थवेद [ ११/९/१७] में "धर्म " शब्द का अर्थ "धार्मिक आचार द्वारा मिलाने वाला पुन्य" है, वाजसनेयी संहिता [२-३] में "ध्रुवेण धर्मणा" अर्थ में "धर्म" शब्द है, छान्दोग्य उपनिषद [२/२३] में "चार आश्रम के विशिष्ट कर्तव्य" इस अर्थ में "धर्म" शब्द आया हुआ है!



तैत्तिरीय- उपनिषद [१/११] में " सत्यं वद, धर्म चर" [सत्य बोलो, धर्मानुसार आचारण करो] ऐसा "धर्म" शब्द का अर्थ है! मनुस्मृति [१/२] में "धर्म" शब्द का अर्थ "वर्णाश्रम विहित कर्तव्य" है! "याज्ञवल्क्य स्मृति " "श्री मद्बगवद्नीता [३/३५] आदि में "धर्म" शब्द का अर्थ कहा गया है!



महर्षि कणादप्रणीत "वैशेषिक-दर्शन " में कहा गया है-----

"यतोsभ्युदयनि: श्रेयससिद्ध: स धर्म:!"



आश्वलायनगृह्यसूत्र में "धर्म" के विषय में कहा है कि "धारणात श्रेय आदधाति इति धर्म:!" अर्थात जिसके अनुसार चलने पर मनुष्य का "श्रेय" [कल्याण] होता है, यश, उन्नति एवं मोक्ष होते हैं, उसे "धर्म" कहते हैं! महर्षि जैमिनी प्रणीत पूर्व मीमांसा में "धर्म" के विषय में कहा है कि " चोदनाल क्षणोsर्थो धर्म:!" अर्थात उपदेश से, आज्ञासे, किंवा विधि से होने वाला श्रेयस्कर अर्थ "धर्म" है! व्यक्ति और समाज की ऐहिक [लौकिक] एवं पारमार्थिक [पारलौकिक] उन्नति के लिये प्राचीन महान ऋषि-मुनियों की आज्ञा ही "धर्म" है!



मनुस्मृति [२/६] में धर्म के लक्षण और आधार के विषय में इस प्रकार स्पष्टीकरण किया गया है---



वेदोsखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम !

आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तूष्टिरेव च!!



अर्थात---समग्र वेद, स्मृति, वेद्वेत्ताओं के शील और आचार तथा धार्मिक संत-सज्जनों के आत्मसंतोष--ये "धर्म" के मूल आधार हैं!



महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा है---



श्रुति: स्मृति: सदाचार: स्वस्य च प्रियमात्मन:!

सम्यक संकल्पज: कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम!![१/७]



अर्थात----वेद, स्मृति, धर्मसूत्रादि, शिष्टजनों के किंवा सज्जनों के आचार [आचरण] और उनके उपदेश के अनुसार तथा अपनी विवेक बुद्धि के अनुसार, आत्मसंतोष के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपना आचारण रखना चाहिये!

[ होम-हवं, सदाचार, इन्द्रियदमन, अहिंसा, दान, वेद-शास्त्र का अध्यन और शास्त्रोक्त कर्मों का अनुष्ठान --इन सब में सर्वोत्तम है! प्राणियों के अभ्युदय और कल्याण के लिये ही धर्म का प्रवचन किया है! अत: जो इस उद्देश्य से युक्त हो अर्थात जिससे अभ्युदय और नि:श्रेयस सिद्ध हों, वही धर्म है, ऐसा धर्वेत्ताओं का निश्चय है!]

जिस शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि क्रिया "धृत " रक्षित हो रही है, उसका नाम धर्म है! जिस आचरण से मन एवं हृदय का विकास होता है, उस आचरण को "धर्म" कहते हैं! सभी प्राणी सुख की इच्छा रखते हैं! ए वह सुख "धर्म" से ही उत्पन्न होता है, अत: समस्त वर्णों को सदैव प्रयत्नपूर्वक धर्म का ही आचारण करना चाहिये!

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मीमांसा - जैमिनी |

अथातो धर्मजिज्ञासा |

http://bit.ly/fRTOsa

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