Hinduism is the Only Dharma

Hinduism is the Only Dharma in this multiverse comprising of Science & Quantum Physics.

Josh Schrei helped me understand G-O-D (Generator-Operator-Destroyer) concept of the divine that is so pervasive in the Vedic tradition/experience. Quantum Theology by Diarmuid O'Murchu and Josh Schrei article compliments the spiritual implications of the new physics. Thanks so much Josh Schrei.

Started this blogger in 2006 & pageviews of over 0.85 Million speak of the popularity.

Dhanyabad from Anil Kumar Mahajan


Tuesday, October 16, 2012

Hindu Heritage BLOG:: Creating the Universe - Shiva Lingam Mahashivaratr...

Hindu Heritage BLOG:: Creating the Universe - Shiva Lingam Mahashivaratr...: http://www.ayu.nl/  - Produced by  http://www.v-mp.com Transcript: Before creation there was a creation. That's was only a 'Bindu' a poi...

Before creation there was a creation.
That's was only a 'Bindu' a point, that started a big explosion much more stronger than
millions of hydrogen bomb. It spreaded all the directions the Bindu started vibrating. Through that vibration the first sound came out that was 'Ohm' and then the light, the colors, the planets, stars, all the creations came.
The Shiva Lingam is a form in which all the material from the cosmos is enclosed in it.
Actually it is the universe in a shape of the Shiva Lingam.

Shiva Lingam is the symbol of our biggest universe, Shiva Lingam is considered
as the unity of Shiva and Shakti that means the female and male energy in one.
Actually that is in everybody in all creations from God you can see female energy is there male energy also there so in a way we all are carrying Shiva Lingam.
Example the head of a person looks like a Shiva Lingam and we have also the 'Anja Chakra'.
That is the third eye or the Nucleus point.

When you search different religions and when you search figures what the nature people are making all over the world being it the Indians in south America or the aboriginals in Australia
you can see similar forms like this Shiva Lingam.
Wood carved by stones or created by themselves or found in the nature.
Everywhere you can see this form, so it is a part of the collective memory from mankind to worship a similar form as a starting of the universe.

When Mohana and Vighnesh Made this Lingam they started with making a small center point and both started energizing it.
After energizing that center point with that very long rope they created the Nadi's and the Chakras.
Nadi's are the energy channels what is connecting you with the energy around you.
Chakras are the energy points in your body there are seven important chakras.
We call them also Maha-marma's.
On the instructions from Mohana Vighnesh was rounding and rounding and knotting to make the Shiva Lingam coming into life, and that took an whole evening from that part we took some pictures and a small film.
Because actually that is the secret part and the sacred part of the Shiva Lingam.

After that a lot of clay was used to cover the center point and to create the Shiva Lingam.
When you see that Shiva Lingam you see a huge form upwards and a huge form in a horizontal plane.
That horizontal plane is the Yoni you can say that is the female form and that upward form that is the Lingam we can say that is the expanding form.
That is the expanding energy.
In that way you have to see that also when you are close by this Shiva Lingam you experience a energy what is coming from within because it is made like that and it has two directions upward direction and it has a horizontal direction and that shows the cosmos what is expanding what is growing what is getting bigger and bigger and that shows also that everything what is happening it is only going forward I cannot repeat yesterday even when I have all the money in the world.
I cannot buy and I cannot make yesterday that is impossible because it is in our genes even in our being in our very existence that the universe is growing it is expanding so we are part of that universe so we are also growing.
There is a evolution going on inside us every second of our life the Shiva Lingam shows that it shows the expanding energy of both sides the female side and the male side we can say the knowledge side and the wisdom side. We can call it dualistic positive negative in the sense of attraction.

In Shiva temples the Puja's or ceremonies showing how important to protect the third eye part of you and your universe so the Abhishekas or the ceremonies offerings are all connected with how to balance how to please how to cool down and how to protect this precious energy it is always spreading enormous energy and its vibration throughout the whole universe so it has to be protected.

When you have a atom that is the smallest building part of our cell then we can see in the center in the nucleus there is a proton there is a positive charge small particle because of that an electron is attracted to that.
That is a negative charged particle and both are keeping each other in balance.
The same with the Shiva Lingam you have the male energy and the female energy and both are in balance.

Shiva Linga is based on 'Vaisheshika Sidhanda' that means the atomic research many thousand years before 'Bharatia' or Indians they were very knowledge about the atom theory and its greatest works but the only difference is now we are seeing the atom knowledge they are using for biological weapon nuclear weapons and destructive purposes but they were using those knowledge in those time to protect the universe and to protect the human beings and other living beings.
That is a big difference but still we have time to go back and take the wisdom from Bharata or India.

Saturday, April 14, 2012

यूँ समझें कि सारा झगड़ा कश्मीर का है जम्मू-कश्मीर का नहीं

कश्मीर बहुत छोटा है आज़ादी के लिए भूटान के दसवें हिस्से जितने क्षेत्रफल वाले लैंड लाक्ड आजाद देश से न भारत का भला होगा न कश्मीरी मुसलमानों का. कश्मीरियों की यह आम शिकायत रहती है कि शेष भारत वाले कश्मीर और कश्मीरियों को सही से समझते नहीं। किसी हद तक यह सही भी है। कश्मीर के विषय में कई मिथकों में से एक मिथक यह तोड़ने की आवश्यकता है कि कश्मीर भारत का एक उत्तरी राज्य है। जी नहीं, कश्मीर एक राज्य नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर राज्य का एक छोटा सा हिस्सा है – 6.98 प्रतिशत हिस्सा। यहाँ तक कि यह कहना भी ग़लत है कि “कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है”, क्योंकि कश्मीर तो भारत का सब से उत्तरी भाग है ही नहीं। वह श्रेय लद्दाख सूबे को जाता है। और यदि भारत का आधिकारिक मानचित्र देखा जाए तो गिलगित और अक्साइ-चिन उससे भी उत्तर में हैं। न लद्दाख, न गिलगित, न अक्साइ चिन कश्मीर का हिस्सा हैं। जिस क्षेत्र को पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहता है, और हम पाक-अधिकृत कश्मीर, वह क्षेत्र भी दरअसल कश्मीर नहीं है। यह लेख प्रयास है यह बतलाने कि इन अंतरों को समझना क्यों ज़रूरी है, विशेषकर जब कश्मीर घाटी में इतना हंगामा हो रहा है। 

राजनीतिक शतरंज के खिलाड़ियों ने कश्मीर की भौगौलिक स्थिति और सीमाओं को लेकर हमेशा एक भ्रामक स्थिति बनाए रखी। आम तौर पर जब लोगों से पूछा जाता है कि कश्मीर कहाँ है, तो वे कहते हैं, “यह रहा” और भारत के मानचित्र के “सिर” की ओर इशारा करते हैं, जैसा कि ऊपर दिये मानचित्र में काले बाणचिह्न से दिखाया गया है। पर वास्तव में वे सचाई से कोसों दूर हैं। इसी नक्शे में लाल बाणचिह्नों के द्वारा लेखक ने कश्मीर की सही स्थिति और सीमा दिखाई है। ऊपर दिए नक्शे में भारत की सरकारी रूप से मान्य सीमाएँ दिखाई गई हैं, और कश्मीर क्षेत्र को लाल रेखाओं द्वारा रेखांकित किया गया है। यदि आप एक “बाहर वाले” के नज़रिए से देखना चाहें तो विकिपीडिया का दाएँ दिया नक्शा देखें — इसे क्लिक कर बड़े आकार में देखा जा सकता है। कश्मीर घाटी की सीमाएँ इस नक्शे में भी लाल रेखाओं द्वारा दिखाई गई हैं।

आप पूछेंगे कि कश्मीर और जम्मू-कश्मीर राज्य में भला क्या अन्तर है? यूँ समझें कि सारा झगड़ा कश्मीर का है जम्मू-कश्मीर का नहीं। कश्मीर सुन्नी-मुस्लिम बहुल है, राज्य के अन्य भाग नहीं। कश्मीर में “गो इंडिया गो” का नारा लग रहा है, जबकि राज्य के अन्य भाग भारतीय होने में खुश हैं। कश्मीर जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा हिस्सा है। पर कश्मीर की परिभाषा क्या है? अच्छा हो कि कश्मीरियों से ही पूछा जाए। कश्मीरी भाषा में घाटी से बाहर के क्षेत्र को “न्यबर” कहा जाता है, यानी बाहर या परदेस। कश्मीर उस जम्मू-कश्मीर राज्य का एक छोटा सा हिस्सा है, जो जम्मू, लद्दाख और कश्मीर को मिला कर बना है। राज्य के तीन सूबे हैं जिनमें कश्मीर सूबा सब से छोटा है। और इस छोटू ने ही सब की नाक में दम कर रखा है। इस क्षेत्र में केवल तीन जिले थे — अनन्तनाग, बारामुल्ला और श्रीनगर, जिन्हें अब दस छोटे जिलों में बाँट दिया गया है।

इसी छोटे से क्षेत्र ने पिछले 63 वर्षों में इस इलाके की राजनीति पर अपना बोलबाला कायम किया है। कश्मीर और जम्मू-कश्मीर के इस अन्तर को हमेशा छुपाया क्यों गया है, और इस अन्तर को उजागर करना क्यों आवश्यक है? दरअसल राज्य का यही छोटा हिस्सा भारत के लिए दर्दे-सर बना हुआ है, क्योंकि इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र ने पूरे राज्य को और पूरे क्षेत्र को अपहृत कर रखा है। राज्य का यह भाग जो राज्य का केवल 7% है, स्वयं को एक गैर मुस्लिम देश का भाग मानने में आनाकानी करता है।

राज्य के दक्षिण में जम्मू है, जो हिन्दू-बहुल है, जहाँ के लोग पंजाब-हिमाचल जैसे हैं, और उत्तर में लद्दाख है जहाँ बौद्ध और शिया मुस्लिम रहते हैं, कुछ कुछ तिब्बत से मिलता जुलता। दोनों क्षेत्रों को भारत का भाग होने में कोई दिक्कत नहीं है। केवल कश्मीर है, जहाँ गैर-मुस्लिमों के पलायन के बाद अब 97% आबादी मुसलमानों की है। यही वह हिस्सा है जो आग का गोला बना हुआ है। वह खूबसूरत वादी, जिसे कभी जन्नत कहा जाता था, और जिसे अलगाववाद ने जहन्नुम में तब्दील कर दिया गया है। इसी क्षेत्र के अधिकांश वासी इस छोटे से क्षेत्र के लिए आज़ादी की माँग कर रहे हैं। इस राज्य की विविधता, भारत की विविधता में तो घुलमिल जाएगी, पर हरे-झंडे ले लेकर पत्थर बरसाते अलगाववादियों के कश्मीर में कैसे चलेगी?

 पाक अधिकृत “कश्मीर” में न कश्मीरी रहते हैं, न वहाँ कश्मीरी बोली जाती है। वहाँ बोली जाने वाली भाषाओं में से एक भी भाषा कश्मीरी से नहीं मिलती जुलती। जाहिर है कि नियन्त्रण रेखा ने किसी परिवार को विभाजित नहीं किया। इस खेल के हर खिलाड़ी के लिए महाराजा हरिसिंह की इस रियासत के ईंट-रोड़े को इकट्ठा रखना एक राजनैतिक मजबूरी रही है — चाहे वह कहीं की ईंट हो कहीं का रोड़ा। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में कुछ भी एक सा नहीं है, सिवाय इसके कि यह तीनों सूबे एक ही राजा के अन्तर्गत थे। हर क्षेत्र की अपनी वांशिकता है, अपना मज़हब, अपनी भौगोलिक स्थिति और प्रवृति, अपनी जलवायु, अपनी संस्कृति और अपनी भाषा। देश में किसी भी राज्य में इतनी विविधता नहीं है।

यहाँ तक कि 1950 के दशक में देश का भाषाई पुनर्गठन तो हुआ पर इस राज्य को नहीं छुआ गया, क्योंकि इसे विशेष स्टेटस हासिल था। भारत शायद इस राज्य को इसलिए इकट्ठा रखना चाहता है कि जम्मू और लद्दाख कश्मीर और शेष भारत के बीच गोंद का काम करें। भारत को लगता है कि राज्य का विभाजन किया तो देश का विभाजन दूर नहीं होगा। पाकिस्तान भी जम्मू-कश्मीर का नाम एक साथ लेता है ताकि वह पूरे राज्य पर अपना दावा ठोक सके और नौबत पड़ने पर शायद हिन्दू क्षेत्रों की सौदेबाजी कर सके।

शायद इसी कारण वे अपने हथियाए हुए इलाके को AJK (आज़ाद जम्मू कश्मीर) कहते हैं, जो न आज़ाद है, न जम्मू है, न कश्मीर है। पाक अधिकृत “कश्मीर” में न कश्मीरी रहते हैं, न वहाँ कश्मीरी बोली जाती है। वहाँ बोली जाने वाली भाषाएँ हैं – पहाड़ी, मीरपुरी, गुज्जरी, हिन्दको, पंजाबी और पश्तो (विकिपीडिया के अनुसार)। इन में से एक भी भाषा कश्मीरी से नहीं मिलती जुलती। इस का अर्थ यह भी है कि नियन्त्रण रेखा ने किसी परिवार को विभाजित नहीं किया है। पर कश्मीरी अलगाववादियों की क्या मजबूरी है कि वे जम्मू-कश्मीर राज्य की बात कर रहे हैं, जबकि उन्हें केवल कश्मीर क्षेत्र से ही सरोकार है?

 जब कश्मीरी मुसलमान भारत का हिस्सा होने के विरुद्ध तर्क देते हैं तो कहते हैं कि वे भारतीयों से वांशिक रूप से अलग हैं, उनका धर्म अलग है। उन में से अधिकांश स्वयं को भारतीय नहीं मानते। कश्मीर के मुसलमान डोगरा राजा हरिसिंह के खिलाफ तो 1947 से भी पहले लड़ रहे थे। तो अब वे जम्मू-कश्मीर की बात कैसे कर रहे हैं? वे महाराजा के जीते अन्य क्षेत्रों पर कैसे दावा ठोक सकते हैं, जब वह महाराजा ही उनके लिए पराया था? लद्दाख, बल्तिस्तान और गिलगित तो उस समय रियासत का हिस्सा भी नहीं थे, जब डोगरा राजाओं ने जम्मू कश्मीर को अंग्रेज़ों से खरीदा। 

लेखक के विचार में कश्मीरियों के इस रवैये के दो कारण हैं — पहला तो यह कि इस तरह वे कह सकेंगे कि हमें इस्लामी पाकिस्तान नहीं चाहिए बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष जम्मू-कश्मीर चाहिए, इससे उन्हें विश्व में सुनवाई मिलेगी — क्योंकि पाकिस्तान और इस्लामी आतंकवाद दुनिया भर में बदनाम हो चुके हैं। दूसरा, इससे उन्हें सौदेबाजी भी करने के लिए जगह मिल जाती है। कश्मीर का जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा अंश होना एक ऐसा तथ्य है जिस के और भी कई अर्थ निकलते हैं। अब चूँकि जम्मू और लद्दाख भारत के साथ खुश हैं, उनके ऊपर तो तथाकथित “आज़ादी” नहीं थोपी जा सकती। बाकी रहा कश्मीर का 6000 वर्ग मील का क्षेत्रफल। यदि इसे एक अलग देश बनाया जाता है, तो यह विश्व के सब से छोटे “लैंड लाक्ड” (ऐसे देश जिनकी कोई सीमा समुद्र से नहीं मिलती) देशों में से होगा – वैकिटन सिटी, लक्समबर्ग और एकाध ही देश इससे छोटे होंगे।

अब आप ही सोचिये कि भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच फंसे इस देश की “आज़ादी” कितने दिन चलेगी? भारत से छुटकारा पाएँगे तो पाकिस्तान निगल जाएगा। दरअसल कश्मीर के कुछ नेता और बेशक पाकिस्तान भी तो मूलतः यही चाहते हैं, पर क्या कश्मीर की आम जनता इसी अंजाम के लिए लड़ रही है? क्या पाकिस्तान उन्हें धारा 370 जैसे विशेषाधिकार देगा? क्या वहाँ भी तालिबानी हुकूमत न चलने लगेगी?

इतने छोटे से भूमि क्षेत्र में क्या इतने प्राकृतिक संसाधन हैं कि यह एक देश बना रहे? जाड़े के महीनों में कश्मीर बर्फ से घिरा रहता है। समुद्र की बात छोड़ें, सड़क से भी वहाँ पहुँचना दूभर हो जाता है। जम्मू श्रीनगर राजमार्ग बन्द हो जाता है तो कश्मीर में खाने के लाले पड़ जाते हैं। बीबीसी का यह पृष्ठ देखें जिस में बताया गया है कि वादिए-कश्मीर आज़ाद की गई तो केवल 1800 वर्ग मील होगी, यानी भूटान का दसवाँ हिस्सा। यह क्षेत्रफल विकिपीडिया पर दिए क्षेत्रफल से काफी कम है, पर जो भी है इस छोटे से क्षेत्र के देश बनने की कल्पना, वह भी ऐसे माहौल में, किसी का भी भला नहीं करेगा। लोकतन्त्र में बहुमत की चलती है, तो राज्य के 7-15% क्षेत्रफल में बसी जनसंख्या पूरे राज्य की बाबत फैसला क्यों करे? 

कठुआ के किसी डोगरी भाषी या लेह के किसी बौद्ध को तो निज़ामे-मुस्तफा की चाहत नहीं है। कश्मीर का जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा अंश होना इस बात को भी झुठलाता है कि लोकतन्त्र होने के नाते बहुमत की बात मानी जानी चाहिए। बिल्कुल सही है, लोकतन्त्र में बहुमत की ही चलती है, पर राज्य के 7-15% क्षेत्रफल में बसी जनसंख्या क्या पूरे राज्य की बाबत फैसला करेगी? क्या यह लोकतन्त्र के खिलाफ नहीं होगा? कठुआ में रह रहे एक डोगरी भाषी या लेह में रह रहे किसी बौद्ध को तो निज़ामे-मुस्तफा (इस्लामी शासन) की चाहत नहीं है। कश्मीर तीन ओर से उन क्षेत्रों से घिरा है जो बेशक भारतवादी हैं, और चौथा यानी पश्चिमी सिरा पाकिस्तान ने हथिया रखा है। 

एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश के लिए कोई इलाका कितना बड़ा होना चाहिए जिस के आधार पर इसके निवासियों को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया जाए? लोकतन्त्र के नाते, क्या अब इसके बाद हैदराबाद या मेरठ के किसी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में रायशुमारी करनी पड़ेगी? कश्मीरी हिन्दुओं की माँग है कि यदि कश्मीरी मुसलमानों उन्हें अपने साथ नहीं रहने देते तो उन्हें “पनुन कश्मीर” (अपना कश्मीर) के नाम से कश्मीर के एक हिस्से में बसाया जाए जो भारत का अभिन्न अंग हो। 

यदि इस बात को बल दिया जाता है तो कश्मीरी अलगाववादियों के पास “देश” के नाम पर और भी कम क्षेत्र बचता है। यदि इतिहास की घड़ी को पीछे धकेला जा सकता तो शायद यह सही रहता कि महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर घाटी को अलग कर पाकिस्तान को सौंप दिया होता। पर राज्य की घुलमुल संरचना के कारण ऐसा नहीं हो सका। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न आकांक्षाएँ थीं, सो उन्होंने राज्य को भारत पाकिस्तान दोनों से अलग रखा। उसके बाद पाकिस्तानी कबाइलियों ने जो किया वह सर्वज्ञात है।

 पर हाँ उस समय यदि वादी पाकिस्तान के हवाले कर दी जाती तो शायद सब के लिए बेहतर होता। कश्मीरी हिन्दू तभी भारत का हिस्सा बन गये हो, पाकिस्तान से आसे अन्य हिन्दूओं की तरह। कश्मीरी मुसलमान खुश होते या नहीं, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। पर बेशक कोई “आज़ादी की लड़ाई” तो नहीं चल रही होती। अलगाववादियों को धर्मनिरपेक्षता, आज़ादी और जम्मू-लद्दाख की चिन्ता का ढ़ोंग तो छोड़ देना चाहिये। कश्मीर घाटी का मर्ज़ एक कैंसर का रूप धारण कर चुका है। 

घातक मर्ज़ के लिए दवा भी घातक चाहिए। कोई भी चरम उपाय होगा तो पूरे शरीर को तकलीफ तो होगी ही। या तो बीमारी का उपचार किया जाय या विष ग्रसित अंग को ही शरीर से पृथक कर दिया जाय। दर्दनाक बात है पर वाकई कश्मीर का आकार इतना छोटा है कि इसके ना होने पर भारत के मानचित्र में कोई बहुत ज़्यादा अन्तर नहीं पड़ेगा। घाटी को या तो देश में पूरी तरह समाहित करना चाहिये (दफा 370 हटाकर) या फिर पूरी तौर से दफा। किसी भी देशभक्त भारतीय की तरह लेखक को भी कश्मीर में लोगों की तकलीफें, और कत्लो-गारत देख कर तकलीफ होती है। पर वहाँ लोग क्यों मारे जा रहे हैं? वहाँ जो अलगाववादी हिंसा हो रही है, उसके कारण वहाँ सेना है, या सेना होने के कारण अलगाववादी हिंसा है? 

1989 से पहले तो सब ठीक था। आप ही बतायें, यदि यह जिहाद आज ही समाप्त हो जाए, तो क्या कुछ ही समय में वहाँ से सेना नहीं हटे जायेगी? कश्मीरी अलगाववादियों को इस प्रश्न का उत्तर मालूम है। उन्हें और उनके नेताओं को यह पता है कि वे जिस दिन चाहेंगे उस दिन निर्दोष लोगों की मौतों को रोक सकते हैं। पर अलगाववादियों की सोच यही है कि जब तक असहाय लोग कुरबान नहीं होंगे तब तक निज़ामे-मुस्तफा नहीं मिलेगा। इतिहास कहता है कि टालमटोल राजनीतिक शक्ति के रहते यह नामुमकिन है कि “आर या पार” जैसा कोई रवैया भारत सरकार अख्तियार करे। शायद इसलिए कश्मीरी मुसलमानों के हित में यही है कि वे यथापूर्व स्थिति को प्राप्त करने का प्रयत्न करें — लड़ाई झगड़ा छोड़ें, भारत के विरुद्ध छिड़ा जेहाद समाप्त करें, स्कूलों, दफ्तरों, सिनेमाओं, खेलगाहों, यहाँ तक कि मैखानों में जाना शुरू करें। जो हिन्दू घाटी छोड़ कर जा चुके हैं, वे तो संभवतः लौटेंगे नहीं। 1989 से पहले जो था, उसे हासिल करें। पर शुरुवात पत्थर-बाज़ी बंद होने से ही हो सकती है। – मूल अंग्रेज़ी लेख से लेखक द्वारा स्वयं अनूदित।

Sunday, January 15, 2012

A history of crimes against India By MV Kamath

A history of crimes against India By MV Kamath

Crimes Against India: And the Need to Protect its Ancient Vedic Tradition: Stephen Knapp; i. Universe, Inc., New York; Pp 358 (PB), $24.95
To read the history of India is to shed tears. Down the centuries outsiders have invaded the country and the people have paid dearly for it. The reason why, for instance, many Muslim rulers could conquer India was simply because Hindu rulers at home would not unite to fight a common enemy. As Knapp puts it in plain terms, “there was a continuous struggle and warfare between the various Rajput states and these rivalries it was which made it impossible for the Rajput rulers to join hands to oust the Ghazaniavids from the Punjab”. When they could not – or would not – fight, they sought peace by giving their daughters in marriage to the invader. And so they survived.
Our history books are also, even today, hesitant to tell the truth about the conquerors. Knapp records that the Bahmani Sultans of Central India made a rule to kill 100,000 Hindus every year. In 1399, Timur killed 100,000 Hindus in a single day, plus more at times. Knapp quotes KS Lal, the historian, as saying that between 1000 AD and 1525 AD, The Hindu population decreased by as many as 80 million.
Says Knapp: “This probably is the biggest holocaust in the history of the whole world, right there in India”. And he rightly asks: “Yet, not many people have either forgotten this threat to the Indian Hindu population or have never heard or learned about it? This negation of Indian history is itself a crime against its population, when the people should know and learn lessons from the past”.
It is not just Muslim invaders who tried to destroy Hinduism – call it Vedic religion, if necessary – in India. The Portuguese rulers in Goa were no less cruel and barbaric. The inquisition they practised once every two years was even worse than any Muslim imposition of Islam on Hindus. One of the Jesuits was to write: “When I have finished baptising the people, I order them to destroy the huts in which they keep their idols; and I have them break the statues of their idols into tiny pieces, since they are now Christians. I could never come to an end describing to you the great consolation which fills my soul when I see idols being destroyed by the hands of those who had been idolators”.
For all that and all that, Hinduism has survived and it is even getting accepted abroad, though Hinduism does not believe in conversion. A well known US media personality is quoted as saying: “Now we are all Hindus”. In Russia, Knapp claims, one per cent of the population aver that they are Hindus. But, it would seem, the worst enemies of Hinduism are Hindus themselves. They are giving up their own Vedic heritage and culture which Knapp describes as “the last bastion of deep spiritual truth”. As he puts it: “The Vedic culture and philosophy offers deep insight into spiritual knowledge that can be found nowhere else” and “it provides for levels of thought and knowledge of the soul and the Supreme, and the spiritual reality that are hardly matched elsewhere”.
The book is divided into four parts. Part One recalls the war against India’s ancient traditions. Knapp insists that “we have to remember that a true religion paves the war for everyone to become spiritually aware and to establish his or her own relationship with the Supreme and the Vedic system is an ideal means for supplying that”. Indeed, he says, “the spiritual principles in the Vedic system are universal, meaning they can be applied in any time or place in the universe”. Part Two describes the battle waged by Indians to protect their culture and what the Ghaznis, the Ghoris, the Slave Sultans, the Khaljis, the Sayyids and the Lodis did to plunder temples and destroy places of worship and otherwise seek to eliminate Hindu culture and civilisation.
Knapp details the sacking of Chidambaram and Sri Rangam, the plunder of Puri’s Jagannath Temple, Sikandar Lodi’s treatment of Mathura, the destruction of Dwarka, the Govindaji Temple in Vrindavan, the Keshava Temple in Mathura, to name a few. What the Portuguese did in Goa is not forgotten, nor what Christian missionaries elsewhere did. One whole chapter is given to the impact of British rule in India.
Part Three deals with the flase image sought to be imposed on Indians by the vicious propagation of the Aryan Invasion theory and the damage it has wrought. Casteism is seen as a scourge of Hinduism or a perversion of a legitimate Vedic System that needs to be fought or at least seen in its proper perspective. Knapp also discusses such issues as the dowry system, bonded labour, malnutrition of poor children and saving the girl child. He spares none. As for the concept of ‘Aryan’ and ‘Dravidian’, Knapp insists that it was used by the British to establish a lower class of Indians who were oppressed by a higher class, and to enable the rulers to “divide the Indian people into quarreling factions”. According to him, the idea of ‘Aryan’ and ‘Dravistian’ people as separate races is not only ‘insidious’, but “completely flase”.
Part Four is more focused on Sanatana dharma and how to educate the GenNext on our Vedic heritage and establish an ‘Open-door’ policy of sharing our culture and traditions with others. Knapp is extremely upset over the manner in which state governments have taken over temples, literally robbing them of their income and using the revenues for purposes other than providing succour to Hindus. An agry knapp says: “The threat to the survival of Hindu civilisation is real … Hindus should not sit quiet, but must be active”. He rubbishes the “elite of India” who damn any Hindu who stands up for his religion as having a “Hindutva mind-set” and one wishing to “saffronise the nation”.
A chapter on Kashmir should be must reading. This is where Knapp says “as many as 60,000 people were killed, 750,000 rendeced homeless and 600 villages renamed with Islamic names”. Adds Knapp: “Inspite of the protests by the Kashmiri Pundits, the world looked the other way and remained silent. India’s government did next to nothing. Even Human Rights activists remained silent, it was another holocaust in India against Hindus with no help from anyone”. There is one unspoken message in this work, to our secularists. It is: “Read it”. But who wants to listen to Truth?

अकबर का सच जो हमसे छुपाया गया और गलत इतिहास पढाया गया

अकबर का सच जो हमसे छुपाया गया और गलत इतिहास पढाया गया

कभी भी कोई भी आत्मसम्मान वाला देश और उसके देशवासी अपने देश को लूटने , अपनी बहन बेटी के बलात्कार करने वाले और हर तरह के व्यभीचारी आक्रमण कर्ताओं लोगो के द्वारा लिखा इतिहास स्वीकार नही कर सकते......तो फिर हम लोगो को क्या हो गया है जो हम महाराणा प्रताप को कायर और अकबर को महान बोलते है....अकबर को महान बोलने वाले लोग यहाँ पर भी देखे...की कैसे हम लोगो से सच को छुपा कर आज तक गुलाम बना कर रखा गया है ...हिन्दुस्तान का अस्तित्वा मिटाने के लिए...इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने साफ़ लिखा है की  अकबर एक सबसे बड़ा दुष्कर्मी, घ्रणित, पूर्व विचारित, न्रिशंश हत्याकांड करने वाला  क्रूर शशक था.....और आप और हम सब क्या पढ़ रहे है की अकबर महानता क्या ये सब महानता के लक्षण होते है??? 
*जून 1561- एटा जिले के (सकित परंगना) के 8 गाओं की हिंदू जनता के विरुद्ध अकबर ने खुद एक आक्रमण का संचालन करा और परोख नाम के गाओं के एक मकान मे १००० से ज़्यादा हिंदुओं को बंद करके जिंदा जलवा दिया था........क्या ये था अकबर महान?
 *क्या अकबर ने हिंदू राजकुमारियों से इज़्ज़त के साथ विवाह करे..नही एक से भी नही...जोधा बाई से  भी नही ....ये सभी बलात उठाई गयी थी या फिर उनके बाप भाई को हिरासत मे ले कर दी गयी यातना बंद करने का एकमात्र शर्त पूरी करने का प्रतिफल थी....चाहे वो राजा भार्मल और उनके ३ राजकुमारों को यातना दे कर उनकी पुत्री को हरम मे भेजने को मज़बूर करना हो ...इसके अनगिनत उदहारण है..सबूतों के साथ..
 * सबसे मनगढ़ंत किस्सा की अकबर ने दया करके सतीप्रथा पे रोक लगा दी..जबकि इसके पीछे उसका मुख्य मकसद केवल यही था की उनके राजाओं को मार कर राजकुलिन हिन्दू  नारियों को अपने हरम में ठूंस दो....राजकुमार जैमल की हत्या के पश्चात अपनी अस्मत बचाने को घोड़े पे सवार होकर सती होने जा रही उसकी पत्नी को अकबर ने शमशान घाट जा रहे सम्बन्धियों को बीच रस्ते से ही पकड़ कर उसके सारे सम्बन्धियों को कारागार में डाल के राजकुमारी को हरम में ठूंस दिया था.....अगर वो दया वाला था तो ससम्मान उसके जिंदा सम्बन्धियों को समर्पित कर देता और जाने देता.
 *अकबर की प्रशंशा के गीत गाने वाला अबुल फज़ल -आईने अकबरी , को अकबर के समय के सारे मुगलों ने अकबर का एक नंबर का निर्लज्ज चापलूस बताया है
 * जिसके खानदान के सारे पुरावाज़ जैसे हुमायूँ , बाबर दुनिया के सबसे बड़े जल्लाद थे और अकबर के बाद के जहागीर और औरंगजेब दुनिया के सबसे बड़े दरिन्दे थे तो ये बीच में महानता की पैदाईश कैसे हो गयी जबकि इसके कुकर्मों के सारे साक्ष्य आज भी उपस्थित है ..लेकिन हम भारतियों की हालत वही है की  
* अकबर के सभी धर्म के सम्मान करने का सबसे बड़ा सबूत----हिन्दुस्थान की सभी नदियों के किनारे छोटे छोटे घाट बने है , जहाँ हिन्दू अपने पर्व पे सरलता से स्नान और पूजा करते है लेकिन हिन्दू राजाओं द्वारा निर्मित allahabaad की किले में जहाँ ये रहता था....गंगा यमुना सरस्वती का संगम ( जहाँ कुम्भ का मेला होता आ रहा है) के किनारे के सारे घाट इस पिशाच मुग़ल ने तोड़ डाले थे...आज भी वो सारे साक्ष्य वह मोजूद है..
 अकबर के सभी धर्म के सम्मान करने का सबसे बड़ा सबूत---२८ फरवरी १५८० को गोवा से एक पुर्तगाली मिशन इसके एक और निवास स्थान फतेहपुर पंहुचा जहाँ उन लोगो ने इनको एक bible भेंट करी जिसे इसने बिना खोले ही वापस कर दिया...( मोदी जी के मुल्ला टोपी न पहनने पे बवाल मचने वाले सेकुलर इसके बारे में क्या कुछ  बोलना चाहेंगे?)
 * हमारे इतिहास में हम लोगो को मुर्ख बनाए को कहा जाता है की अकबर को देवी आती थी जबकि 1578 में उसे पहली बार मिर्गी का दौरा पड़ा था क्योंकि उसके सभी दरबारी उससे बगावत कर रहे थे जिससे उसकी मानसिक हालत ख़राब हो चुकी थी
 *4 आगस्त  १५८२ को इस्लाम को अस्वीकार करने के कारन सूरत के २ ईसई युवकों को अकबर ने अपने हाथों से क़त्ल किया था जबकि इसाईयों ने इन दोनों युवकों को छोड़ने के लिए १००० सोने के सिक्को का सौदा  किया था..लेकिन उसने क़त्ल ज्यादा सही समझा..
 *augest 1582 में 20 नवजात हिन्दू शिशुओं को उनकी माताओं से छीन कर भाषा उत्पत्ति नमक एक गन्दा अमानवीय प्रयोग करने के लिए एकांत और निर्जन स्थान पे भेज दिया जिसमे वो सभी अकाल मृत्यु  के शिकार हो गए..
 *1587 में जनता का धन लुटने और अपने खिलाफ हो रहे विरोधों को ख़तम करने के लिए अकबर ने एक आदेश पारित करा की जो भी उससे मिलना चाहेगा उसको अपनी उम्र के बराबर मुद्रए उसको भेंट में देनी पड़ेगी.
 * जिन्दगी भर अकबर की गुलामी करने वाले हिन्दू राजा टोडरमल ने अपने जीवन के आखिरी समय में अपनी गलती मान कर उसके प्रेषित के लिए हरिद्वार में अपने प्राण त्यागने की इच्छा जताई थी..
 *औरतों का झूठा सम्मान करने वाले अकबर ने सिर्फ राजपाट और अपनी हवास के लिए न जाने कितनी मुस्लिम औरतों की अस्मत लुटी थी और हिन्दू औरतों को हरम में ठूंस दिया था..इसमें मुस्लिम नारी चाँद बीबी का नाम भी है
 औरतों का झूठा सम्मान करने वाले अकबर ने सिर्फ राजपाट और अपनी हवास के लिए अपनी सगी बेटी आराम बेगम की पूरी जिंदगी शादी नहीं की और अंत में उस की मौत अविवाहित ही जहागीर के शाशन काल में हुयी... 
*दिनभर इसके चाटुकारिता करने वाले अबुल फज़ल की चापलूसी की हरकतों से तंग आके अकबर के पुत्र सलीम ने ही उसको घात लगा के ग्वालियर में हत्या कर दी थी 
*जीवन भर इससे युद्ध करने वाले महान महाराणा प्रताप जी से अंत में इसने खुद ही हार मान ली थी और इसको हरा कर हिन्दू राजाओं की अस्मत बचाने का श्रय हिन्दू राजाओं ने महाराणा प्रताप के ही सर पे बंधा था..( इन्ही महारण को मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दू क़त्ल के प्यासे गाँधी ने कायर बताया था)...इसी परंपरा को अकबर के पुत्र जहागीर ने आगेबढ़ाया था की अकबर के बार बार निवेदन करने पे भी जीवन भर जहागीर केवल ये बहाना करके .महराना प्रताप के पुत्र अमर सिंह से युद्ध करने नहीं गया की उसके पास हथियारों और सैनिकों की कमी है..जबकि असलियत ये थी की उसको अपने बाप का बुरा हश्र याद था.

शेष जारी....अभी बहुत कुछ है बाकि..

खगोलीय दृष्टि से दिवाली का महत्व :-

खगोलीय दृष्टि से दिवाली का महत्व :-

मेष एवं तुला की संक्रांति में सूर्य विषुवत रेखा (नाड़ीवृत्त) पर रहता है, जिसे देवता 6 माह तक उत्तर की ओर तथा राक्षस 6 माह तक दक्षिण की ओर खींचते हैं। मंदराचल पर्वत ही नाड़ीवृत्त है, जिसके एक भाग में मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह और कन्या राशि हैं जिन्हें देवता खींचते हैं। दूसरे भाग में तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि हैं जिन्हें राक्षस खींचते हैं। मंथन से चौदह रत्न निकलते हैं, जिनमें महालक्ष्मी कार्तिक की अमावस्या को प्रकट होती हैं।

कार्तिक कृष्ण अमावस्या को समुद्र मंथन के परिणामस्वरूप महालक्ष्मी का जन्म हुआ था। हम जिस लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं वह अब भी प्रतिवर्ष समुद्रमंथन से निकलती हैं। ज्योतिषशास्त्र, भूगोल या खगोल की दृष्टि से देखें तो सूर्य को सभी ग्रहों का केंद्र एवं राजा माना गया है। सूर्य की बारह संक्रांतियां हैं। नाड़ीवृत्त मध्य में होता है, तीन क्रांतिवृत्त उत्तर को और तीन दक्षिण को होते हैं।

समुद्र मंथन में भगवान विष्णु की ही बड़ी भूमिका रही है और सूर्य ही भगवान विष्णु स्वरूप हैं। सूर्य क्रांतिवृत्त पर विचरण करता है। यह 6 माह उत्तर गोल में एवं 6 माह दक्षिण गोल में विचरण करता है, जिन्हें देवभाग एवं राक्षस भाग भी कहते हैं। मेष एवं तुला की संक्रांति में सूर्य विषुवत रेखा (नाड़ीवृत्त) पर रहता है, जिसे देवता 6 माह तक उत्तर की ओर तथा राक्षस 6 माह तक दक्षिण की ओर खींचते हैं।
मंदराचल पर्वत ही नाड़ीवृत्त है, जिसके एक भाग में मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह व कन्या राशि हैं जिन्हें देवता खींचते हैं। दूसरे भाग में तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ व मीन राशि हैं जिन्हें राक्षस खींचते हैं। मंथन से चौदह रत्न निकलते हैं, जिनमें महालक्ष्मी कार्तिक की अमावस्या को प्रकट होती हैं।

लक्ष्मी, महालक्ष्मी, राजलक्ष्मी, गृहलक्ष्मी आदि लक्ष्मी के अनेक रूप हैं। लक्ष्मी विहीन होने पर लोग ज्योतिष की शरण में भी जाते हैं। दीपावली के लिए पुराणों में अनेक कथाएं हैं। वास्तव में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को पृथ्वी का जन्म हुआ था और पृथ्वी ही महालक्ष्मी के रूप में विष्णु की पत्नी मानी गई है। दीपावली पृथ्वी का जन्मदिन है, इसलिए इस दिन सफाई करके धूमावती नामक दरिद्रा को कूड़े-करकट के रूप में घर से बाहर निकालकर सब ओर ज्योति जलाते हैं तथा श्री कमला लक्ष्मी का आह्वान करते हैं।
दीपावली से पूर्व अच्छी वर्षा से धनधान्य की समृद्धि रूपी लक्ष्मी का आगमन भी होता है। संवत्सर के उत्तरभाग में ऋत सोम तत्व रहता है जो लगातार दक्षिण की ओर बहता रहता है। दक्षिण भाग में ऋत अग्नि रहती है जो हमेशा उत्तर की ओर बहती है। लक्ष्मी का आगमन ऋताग्नि का आगमन ही होता है।
यह दक्षिण से होता है, इसीलिए आज भी भारतीय किसान फसल की पहली कटाई दक्षिण दिशा से ही करता है। ऋताग्नि एक ऐसी ज्योति है जो पूरी प्रजा को सुख-शांति एवं समृद्धि प्रदान करती है और वही महालक्ष्मी है। ज्योतिषशास्त्र में भी जन्मकालीन ग्रहयोगों के आधार पर महालक्ष्मी योग देखा जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है-

लक्ष्मीस्थानं त्रिकोणं स्यात् विष्णुस्थानं तु केंद्रकम्।
तयो: संबंधमात्रेण राज्यश्रीलगते नर: ।।

यह योग श्री लक्ष्मी प्राप्ति का संकेत देता है। केंद्रस्थान में लग्न, चतुर्थ, सप्तम एवं दशम भाव गिने जाते हैं तथा त्रिकोण स्थान में पंचम एवं नवम भाव को माना गया है। जिस व्यक्ति का शरीर स्वस्थ हो, स्थायी संपत्ति, सुख-सुविधा के साधन हों, जीवनसाथी मनोनुकूल हो तो वह विष्णुस्वरूप बन जाता है।
इन सब गुणों का उपयोग सद्बुद्धि एवं धर्मपरायणता के साथ हो तो व्यक्ति महालक्ष्मी एवं राज्यश्री को प्राप्त करने वाला होता है। व्यक्ति यदि कर्मशील होगा, सदाचारी होगा, गुरुनिंदा, चोरी, हिंसा आदि दुराचारों से दूर रहेगा तो लक्ष्मी स्वत: उसके यहां स्थान बना लेगी।

पौराणिक प्रसंगों में स्वयं लक्ष्मी कहती हैं-

नाकर्मशीले पुरुषे वरामि, न नास्तिके, सांकरिके कृतघ्ने।
न भिन्नवृत्ते, न नृशंरावण्रे, न चापि चौरे, न गुरुष्वसूये।।
अत: कर्मशील एवं सदाचारी व्यक्ति को ही राज्यश्री एवं महालक्ष्मी योग बन पाता है। जबकि लोगों की ऐसी धारणा है कि खूब पैसा, धन दौलत हो तो आनंद की प्राप्ति हो सकती है, पर यह धारणा गलत है। ज्योतिषशास्त्र एवं पौराणिक ग्रंथों में महालक्ष्मी का स्वरूप दन-दौलत या संपत्ति के रूप में नहीं बताया गया है।

लक्ष्मीवान उस व्यक्ति को माना गया है जिसका शरीर सही रहे और जिसे जीवन के हर मोड़ पर प्रसन्नता के भाव मिलते रहें। मुद्रा के स्थान एवं खर्च के स्थान को महालक्ष्मीयोग का कारक नहीं माना गया है बल्कि प्राप्त मुद्रा रूपी लक्ष्मी को सद्बुद्धि के साथ कैसे खर्च करके आनंद लिया जाए, इसे माना गया है। इसीलिए महालक्ष्मी पूजन में महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं गणोश जी का पूजन एक साथ किया जाता है।
गणोश बुद्धि के देवता हैं तथा सरस्वती ज्ञान की देवी हैं, इसीलिए लक्ष्मी के पहले श्री शब्द लगाया जाता है। यह श्री सरस्वती का बोधक होता है। इसका भाव यह निकलता है कि मुद्रारूपी लक्ष्मी को भी यदि कोई प्राप्त करता है तो श्रेष्ठ गति के साथ जो उसका उपयोग एवं उपभोग करता है, वह आनंद की अनुभूति करता है।


The presence in Arabia of many Hindus. mostly Brahmins. before the rise of Islam, has been recorded by the historian Sisir Kumar Mitra, in his book ‘The Vision of India’. page 183. These people observed Hindu religious customs, including the worship of Shiva and Makresha from which the name of Mecca is said to have been derived. The famous astrologer Yavanacharya was born of one such Brahmin family. It was from these Brahmins that the Arabs learnt the science of Mathematics, Astrology, Algebra and decimal notation which were first developed in India.

At the time of the war of Karbala (Oct. 680 AD). Rahab Sidh Datt, a potentate of Datt sect, was a highly esteemed figure of Arabia due to his close relations with the family of Prophet Mohammed. In the holy war when no Muslim King came to help Hussain. Rahab fought On his side mld sacrificed his seven sons (named Sahas Rai. Haras Rai, Sher Khan, Rai Pun, Ram Singh, Dharoo and Poroo) in the bloody war.

A Brief Account of the Episode: After the death of Mohammed, he was succeeded by Abu Bakr, Omar and Osman, as the Caliphs: all three were related to him by marriage alliances. Osman was not popular and was assassinated. After his death, Hazrat AlL the son-in-law of Mohammed (he was also his first cousin) who was married to the Prophet’s third daughter and the only surviving issue, Bibi Fatima Zahira, became the 4th Caliph. There was stiff opposition to Ali’s rule from Amir Moavia, a known protege of Osman. He fought with him a bitter war for 5 years and finally got him murdered in a mosque of Koofa, his mausoleum with a golden dome, stands in the nearby town of Najaf (Iraq). After the extermination of Ali, Moavia grabbed the Caliphate and converted the Islamic state into a kingdom, After his death, his notorious son Yazid became the next ruler. However, the rightful claimants of the Caliphate were the descendants of Hazrat Ali, namely, Hassan and Hussain. While Hassan abdicated his claim to the crown and later died of suspected poisoning, his younger brother Imam Hussain who was till then leading a secluded life in Medina, came out and challenged the usurper, Yazid. It was the war of attrition between the two which led to the bloodshed of Karbala (102 km south of Baghdad), on Oct. 10, 680 AD.

The participation of the Mohyals Brahmins and more precisely that of a Dutt family living in Arabia at that time, in the holy war, is a fact of the history. They were a part of the entourage of 200 men and women, including 72 members of Hussain’s family (40 on foot and 32 on horseback), when he left Medina and made an arduous trek to Karbala, where he had a large friendly following. After 18 days, i.e. on the 2nd. day of Mohurrum, the Hussain’s caravan reached Karbala, on the bank of river Euphrates and surrounded by a hostile desert. On the 7th day of Mohurrum, all hell broke out when 30,000 strong army sent by Yazid from Mecca and other places, attacked them. 6,000 soldiers guarded the river bank to ensure that not a drop of water reached the Hussain’s thirsty innocents. By sunset of 10th (Ashoor), a Friday, all were dead including his step brother Abbas (32), his son Ali Akbar (22), daughter Skeena (4) and 6 months old infant Ali Asghar who was killed by an arrow while perched in his lap. Imam Hussain himself was slain with thirty three strokes of lances and swords by Shimr, the hatchet man of ignominious Yazid. The ruffians of Yazid, as they ran carrying the smitten head of Hussain to the castle of Koofa, were chased by Rahab. He retrieved the holy man’s head, washed it reverentially and then carried it to Damascus. According to legend, he was overtaken by Yazid’s men during his ovenight shelter on the way. They demanded Hussain’s head from him: Rahab executed the head of one of his sons and offered to them. They shouted that it was not the Hussain’s head, then he beheaded his second son and they again yelled that it was not his. In this way Rahab executed the heads of his seven sons but did not part with the head of Imam Hussain. Later, after one year, it was buried in Karbala along with rest of his body.

The intrepid Datts rallied round Amir Mukhtar, the chief of the partisans of Imam Hussain, fought with extraordinary heroism and captured and razed the fort of Koofa, seat of Yazid’s governor, Obaidullah, the Butcher. After scoring a resounding victory on the battlefield, they beat the drums and yelled out that they had avenged the innocent blood of Hussain shed at Karbala.
It is also significant to note that even before the Karbala incident, Hazrat Ali had entrusted the public exchequer to the regiment of the valiant Datts, at the time of the Battle of Camels fought near Basra.

The above provides an impeccable evidence about tha pragmatic role played by the Datt Mohyals in the catastrophe of Karbala. There are more than a dozen ballads composed centuries ago which vividly and with great passion describe the scenario of the historic event.

Interestingly, in the Preface of his famous historical novel, titled Karbala, published in 1924 from Lucknow, Munshi Prem Chand has stated that the Hindus who fought and sacrificed their lives in the holy war of Karbala, are believed to be the descendants of Ashvathama.This clearly establishes their link with the Datts who consider Ashvathama as an ancestor of their clan.

Later on, when Sunnis let loose an orgy of vendetta on Shias and Datts, Datts returned to their motherland around 700 AD and settled at Dina Nagar, District Sialkot (vide Bandobast Report of Gujarat by Mirza Azam Beg page 422 and folk songs) and some drifted to as far as the holy Pushkar in Rajasthan. Starting from Harya Bandar (modern Basra on the bank of river Tigris) with swords in hand and beating durms, they forced their way through Syria and Asia Minor and marching onwards captured Ghazni, Balkh and Bukhara. After annexing Kandhar, they converged on Sind and crossing the Sind at Attock they entered the Punjab.
An ancestor of Rahab named Sidh Viyog Datt assumed the title of Sultan and made Arabia (old name Iraq) his home. He was a tough and tenacious fighter. He was also known as Mir Sidhani. He was a worshipper of Brahma. He was the son of the stalwart Sidh Jhoja (Vaj) who was a savant and saint and lived in Arabia (Iraq) around 600 AD.
The supporters of Hassan and Hussain honoured the Datts with the htle of ‘Hussaini Brahmin’ and treated them with great reverence in grateful recognition of the supreme sacrifices made by them in the war of Karbala. According to Jang Nama, written by Ahmed Punjabi, pages 175-176, it was ordained on the Shias to recite the name of Rahab in their daily prayer. At the time to the Karbala, fourteen hundred Hussaini Brahmins lived in Baghdad alone

Sacred Symbols Endearing Icons of Hindu Art & Culture

Sacred Symbols Endearing Icons of Hindu Art & Culture

Endearing images embodying intuitions of the spirit that adorn Hindu art, architecture and iconography symbols adorn our world and mind at every turn -- in our spiritual, social and political experience. A ring or gold pendant serves to silently attest to and strengthen wedded love. On a mountainous road in any country, a sign with a truck silhouette on a steeply angled line warns drivers of dropping grades ahead. The red cross signals aid and comfort in crises. Golden arches tell the vegan to beware. Among the best known symbols in the world are the simple numerals: 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 and 9. They originated in ancient India as characters of the Brahmi script. Now and then, historic images or happenings are supercharged into symbols. The awesome mushroom cloud of the terrifying specter of nuclear destruction.

It is humanity's sacred symbols, its icons of Divinity and Reality, that wield the greatest power to inform and transform consciousness. Taoists gazing upon a yin-yang symbol, Navajo Indians delicately pouring a feather symbol in a sand painting,

Pranava Aum
Pranava, Aum, is the root mantra and primal sound from which all creation issues forth. It is associated with Lord Ganesha. Its three syllables stand at the beginning and end of every sacred verse, every human act.

Ganesha is the Lord of Obstacles and Ruler of Dharma. Seated upon His throne, He guides our karmas through creating and removing obstacles from our path. We seek His permission and blessings in every undertaking. 

Vata, the banyan tree, Ficus indicus, symbolizes Hinduism, which branches out in all directions, draws from many roots, spreads shade far and wide, yet stems from one great trunk. Siva as Silent Sage sits beneath it.

Tripundra is a Saivite's great mark, three stripes of white vibhuti on the brow. This holy ash signifies purity and the burning away of anava, karma and maya. The bindu, or dot, at the third eye quickens spiritual insight.

Nataraja is Siva as "King of Dance." Carved in stone or cast in bronze, His ananda tandava, the fierce ballet of bliss, dances the cosmos into and out of existence within the fiery arch of flames denoting consciousness. 

Mayil, "peacock," is Lord Murugan's mount, swift and beautiful like Karttikeya Himself. The proud display of the dancing peacock symbolizes religion in full, unfolded glory. His shrill cry warns of approaching harm. 

Nandi is Lord Siva's mount, or vahana. This huge white bull with a black tail, whose name means "joyful," disciplined animality kneeling at Siva's feet, is the ideal devotee, the pure joy and strength of Saiva Dharma. 

Bilva is the bael tree. Its fruit, flowers and leaves are all sacred to Siva, liberation's summit. Planting Aegle marmelos trees around home or temple is sanctifying, as is worshiping a Linga with bilva leaves and water. 

Padma is the lotus flower, Nelumbo nucifera, perfection of beauty, associated with Deities and the chakras, especially the 1,000-petaled sahasrara. Rooted in the mud, its blossom is a promise of purity and unfoldment.

Swastika is the symbol of auspiciousness and good fortune -- literally, "It is well." The right-angled arms of this ancient sun-sign denote the indirect way that Divinity is apprehended: by intuition and not by intellect. 

Mahakala, "Great Time," presides above creation's golden arch. Devouring instants and eons, with a ferocious face, He is Time beyond time, reminder of this world's transitoriness, that sin and suffering will pass. 

Ankusha, the goad held in Lord Ganesha's right hand, is used to remove obstacles from dharma's path. It is the force by which all wrongful things are repelled from us, the sharp prod which spurs the dullards onward. 

Anjali, the gesture of two hands brought together near the heart, means to "honor or celebrate." It is our Hindu greeting, two joined as one, the bringing together of matter and spirit, the self meeting the Self in all.

Go, the cow, is a symbol of the earth, the nourisher, the ever-giving, undemanding provider. To the Hindu, all animals are sacred, and we acknowledge this reverence of life in our special affection for the gentle cow.

Ghanta is the bell used in ritual puja, which engages all senses, including hearing. Its ringing summons the Gods, stimulates the inner ear and reminds us that, like sound, the world may be perceived but not possessed.
Gopuras are the towering stone gateways through which pilgrims enter the South Indian temple. Richly ornamented with myriad sculptures of the divine pantheon, their tiers symbolize the several planes of existence.

Kalasha, a husked coconut circled by five mango leaves on a pot, is used in puja to represent any God, especially Lord Ganesha. Breaking a coconut before His shrine is the ego's shattering to reveal the sweet fruit inside.

Kuttuvilaku, the standing oil lamp, symbolizes the dispelling of ignorance and awakening of the divine light within us. Its soft glow illumines the temple or shrine room, keeping the atmosphere pure and serene

Rudraksha seeds, Eleocarpus ganitrus, are prized as the compassionate tears Lord Siva shed for mankind's suffering. Saivites wear malas of them always as a symbol of God's love, chanting on each bead, "Aum Namah Sivaya.

Siva's trident carried by Himalayan yogis, is the royal scepter of the Saiva Dharma. Its triple prongs betoken desire, action and wisdom; ida, pingala and sushumna; and the gunas -- sattva, rajas and tamas.

Dhvaja, "flag," is the orange or red banner flown above temples, at festivals and in processions. It is a symbol of victory, signal to all that "Sanatana Dharma shall prevail." Its color betokens the sun's life-giving glow.

Kalachakra, "wheel, or circle, of time," is the symbol of perfect creation, of the cycles of existence. Time and space are interwoven, and eight spokes mark the directions, each ruled by a Deity and having a unique quality.

इस्लाम दास प्रथा और जाति प्रथा

इस्लाम भ्रातृ-भाव की बात कहता है। हर व्यक्ति यही अनुमान लगाता है कि इस्लाम दास प्रथा और जाति प्रथा से मुक्त होगा। गुलामी के बारे में तो कहने की आवश्यकता ही नहीं। अब कानून यह समाप्त हो चुकी है। परन्तु जब यह विद्यमान थी, तो ज्यादातर समर्थन इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से ही मिलता था। कुरान में पैंगबर ने गुलामों के साथ उचित इस्लाम में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस अभिषाप के उन्मूलन के समर्थन में हो।

मुसलमान दो मुखय सामाजिक विभाग मानते हैं-१. अशरफ अथवा शरु और २. अज़लफ। अशरफ से तात्पर्य है 'कुलीन' और शेष अन्य मुसलमान जिनमें व्यावसायिक वर्ग और निचली जातियों के मुसलमान शामिल हैं उन्हें अज़लफ अर्थात्‌ नीचा अथवा निकृष्ट व्यक्ति माना जाता है। उन्हें कमीना अथवा इतर कमीन या रासिल, जो रिजाल का भ्रष्ट रूप है, 'बेकार' कहा जाता है। कुछ स्थानों पर एक तीसरा वर्ग 'अरज़ल' भी है, जिसमें आने वाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं। उनके साथ कोई भी अन्य मुसलमान मिलेगा-जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक कब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है।
१. 'अशरफ' अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान (प) सैयद, (पप) शेख, (पपप) पठान, (पअ) मुगल, (अ) मलिक और (अप) मिर्ज़ा।

२. 'अज़लफ' अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान 
  1. खेती करने वाले शेख और अन्य वे लोग जो मूलतः हिन्दू थे, किन्तु किसी बुद्धिजीवी वर्ग से सम्बन्धित नहीं हैं और जिन्हें अशरफ समुदाय,     अर्थात्‌ पिराली और ठकराई आदि में प्रवेश नहीं मिला है।

  2. दर्जी, जुलाहा, फकीर और रंगरेज।

 3. बाढ़ी, भटियारा, चिक, चूड़ीहार, दाई, धावा, धुनिया, गड्‌डी, कलाल, कसाई, कुला, कुंजरा, लहेरी, माहीफरोश, मल्लाह, नालिया, निकारी।

  4. अब्दाल, बाको, बेडिया, भाट, चंबा, डफाली, धोबी, हज्जाम, मुचो, नगारची, नट, पनवाड़िया, मदारिया, तुन्तिया।

३. 'अरजल' अथवा निकृष्ट वर्ग भानार, हलालखोदर, हिजड़ा, कसंबी, लालबेगी, मोगता, मेहतर।

पंचायत का प्राधिकार सामाजिक तथा व्यापार सम्बन्धी मामलों तक व्याप्त है और........अन्य समुदायों के लोगों से विवाह एक ऐसा अपराध है, जिस पर शासी निकायकार्यवाही करता है। परिणामत: ये वर्ग भी हिन्दू जातियों के समान ही प्रायः कठोर संगोती हैं, अंतर-विवाह पर रोक ऊंची जातियों से लेकर नीची जातियों तक लागू है। उदाहरणतः कोई घूमा अपनी ही जाति अर्थात्‌ घूमा में ही विवाह कर सकता है। यदि इस नियम की अवहेलना की जाती है तो ऐसा करने वाले को तत्काल पंचायत के समक्ष पेश किया जाता है। एक जाति का कोई भी व्यक्ति आसानी से किसी दूसरी जाति में प्रवेश नहीं ले पाता और उसे अपनी उसी जाति का नाम कायम रखना पड़ता है, जिसमें उसने जन्म लिया है। यदि वह अपना लेता है, तब भी उसे उसी समुदाय का माना जाता है, जिसमें कि उसने जन्म लिया था..... हजारों जुलाहे कसाई का धंधा अपना चुके हैं, किन्तु वे अब भी जुलाहे ही कहे जाते हैं।''

इसी तरह के तथ्य अन्य भारतीय प्रान्तों के बारे में भी वहाँ की जनगणना रिपोर्टों से वे लोग एकत्रित कर सकते हैं, जो उनका उल्लेख करना चाहते हों। परन्तु बंगाल के तयि ही यह दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि मुसलमानों में जाति प्राणी ही नहीं, छुआछूत भी प्रचलित है।

९. इस्लामी कानून समाज-सुधार के विरोधी-''मुसलमानों में इन बुराइयों का होना दुखदहैं। किन्तु उससे भी अधिक दुखद तथ्य यह है कि भारत के मुसलमानों में समाज सुधार का ऐसा कोई संगठित आन्दोलन नहीं उभरा जो इन बुराईयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके। हिन्दुओं में भी अनेक सामाजिक बुराईयां हैं। परन्तु सन्तोषजनक बात यह है कि उनमें से अनेक इनकी विद्यमानता के प्रति सजग हैं और उनमें से कुछ उन बुराईयों के उन्मूलन हेतु सक्रिय तौर पर आन्दोलन भी चला रहे हैं। दूसरी ओर, मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि ये बुराईयां हैं। परिणामतः वे उनके निवारण हेतु सक्रियता भी नहीं दर्शाते। इसके विपरीत, वे अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों ने केन्द्रीय असेंबली में १९३० में पेश किए गए बाल विवाह विरोधी विधेयक का भी विरोध किया था, जिसमें लड़की की विवाह-योग्य आयु १४ वर्ष् और लड़के की १८ वर्ष करने का प्रावधान था। मुसलमानों ने इस विधेयक का विरोध इस आधार पर किया कि ऐसा किया जाना मुस्लिम धर्मग्रन्थ द्वारा निर्धारित कानून के विरुद्ध होगा। उन्होंने इस विधेयक का हर चरण पर विरोध ही नहीं किया, बल्कि जब यह कानून बन गया तो उसके खिलाफ सविनय अवज्ञाअभियान भी छेड़ा। सौभाग्य से उक्त अधिनियम के विरुद्ध मुसलमानों द्वारा छोड़ा गया वह अभ्यिान फेल नहीं हो पाया, और उन्हीं दिनों कांग्रेस द्वारा चलाए गए सविनय अवज्ञा आन्दोलन में समा गया। परन्तु उस अभियान से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि मुसलमान समाज सुधार के कितने प्रबल विरोधी हैं।'' (पृ. २२६)
(सभी उद्धरण बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्‌मय, खंड १५-'पाकिस्तान और भारत के विभाजन, २००० से लिए गए हैं)

भारत में छूआछूत का कलंक मुसलमानों की देन

भारत में छूआछूत का कलंक मुसलमानों की देन

कुछ लोगों का मानना है कि भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार बहुत ही सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुआ है. उनका यह भी कहना है की हिंदू समाज में छुआछात के कारण भारत में हिन्दुओं ने बड़ी मात्रा में इस्लाम को अपनाया. उनके शब्दों में -

"हिंदुओं के मध्‍य फैले रूढिगत जातिवाद और छूआछात के कारणवश खासतौर पर कथित पिछड़ी जातियों के लोग इस्‍लाम के साम्‍यभाव और भाईचारे की ओर आकृष्‍ट हुए और स्‍वेच्‍छापूर्वक इस्‍लाम को ग्रहण किया।" 

जिन लोगों ने अंग्रेजों द्वारा लिखे गए व स्वतंत्र भारत के वामपंथी 'बुद्धिजीवियों' द्वारा दुर्भावनापूर्वक विकृत किये गए भारतीय इतिहास को पढ़कर अपनी उपर्युक्त धारणाएँ बना रखीं हैं, उन्हें इतिहास का शोधपरक अध्ययन करना चाहिए. उपर्युक्त कथन के विपरीत, सूर्य जैसा जगमगाता हुआ सच तो यह है कि भारत के लोगों का इस्लाम के साथ पहला-पहला परिचय युद्ध के मैदान में हुआ था.

भारतवासियों ने पहले ही दिन से 'दीन' के बन्दों के 'ईमान' में मल्लेछ प्रवृत्ति वाले असुरों की झलक को साफ़-साफ़ देख लिया था तथा उस पहले ही दिन से भारत के लोगों ने उन क्रूर आक्रान्ताओं और बर्बर लोगों से घृणा करना शुरू कर दिया था. 

अतः, इस कथन में कोई सच्चाई नहीं है कि भारत के लोगों ने इस्लाम के कथित 'साम्यभाव और भाईचारे' के दर्शन किये और उससे आकर्षित होकर स्वेच्छापूर्वक इस्लाम को ग्रहण किया.

असल में, हिंदुत्व और इस्लाम, दोनों बिलकुल भिन्न विचारधाराएँ हैं, बल्कि साफ़ कहा जाए तो दोनों एक दूसरे से पूर्णतया विपरीत मान्यताओं वाली संस्कृतियाँ हैं, जिनके मध्य सदियों पहले शुरू हुआ संघर्ष आज तक चल रहा है.

हाँ, इस्लामी आक्रमण के अनेक वर्षों बाद भारत में कुछ समय के लिए सूफियों का खूब बोलबाला रहा. सूफियों के उस 'उदारवादी' काल में निश्चित रूप से इस्लामी क्रूरता भी मंद पड़ गयी थी. परन्तु, उस काल में भी भारत के मूल हिंदू समाज ने कथित इस्लामी 'साम्यभाव' से मोहित होकर स्वेच्छापूर्वक इस्लाम को अपनाने का कोई अभियान शुरू कर दिया था, इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता है. 

हाँ, संघर्ष की इस लम्बी कालावधि में स्वयं समय ने ही कुछ घाव भरे और अंग्रेजों के आगमन से पहले तक दोनों समुदायों के लोगों ने परस्पर संघर्ष रहित जीवन जीने का कुछ-कुछ ढंग सीख लिया था. उस समय इस्लामिक कट्टरवाद अंततः भारतीय संस्कृति में विलीन होने लगा था.

यथार्थ में, भारत के हिन्दुओं को इस्लाम के कथित 'साम्यभाव और भाईचारे' का कभी भी परिचय नहीं मिल पाया. इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि मुसलमानों ने भारत के सनातन-हिंदू-धर्मावलम्बियों के साथ किसी दूसरे कारण से नहीं, बल्कि इस्लाम के ही नाम पर लगातार संघर्ष जारी रखा है. हिन्दुओं ने भी इस्लामी आतकवादियों के समक्ष कभी भी अपनी हार नहीं मानी और वे मुसलमानों के प्रथम आक्रमण के समय से ही उनके अमानवीय तौर-तरीकों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष करते आ रहे हैं. महमूद गज़नबी हो या तैमूरलंग, नादिरशाह हो या औरंगजेब, जिन्ना हो या जिया उल हक अथवा मुशर्रफ, कट्टरपंथी मुसलमानों के विरुद्ध हिन्दुओं का संघर्ष पिछले 1200 वर्षों से लगातार चलता आ रहा है. 

जिस इस्लाम के कारण भारत देश में सदियों से चला आ रहा भीषण संघर्ष आज भी जारी हो, उसके मूल निवासियों के बारे में यह कहना कि यहाँ के लोग उसी 'इस्‍लाम के साम्‍यभाव और भाईचारे की ओर आकृष्‍ट हुए', एक निराधार कल्पना मात्र है, जोकि सत्य से कोसों दूर है. भारत के इतिहास में ऐसा एक भी प्रमाण नहीं मिलता जिसमे हिंदू समाज के लोगों ने इस्लाम में साम्यभाव देखा हो और इसके भाई चारे से आकृष्ट होकर लोगों ने सामूहिक रूप से इस्लाम को अपनाया हो. 

आइये, अब हिन्दुओं के रूढ़िगत जातिवाद और छुआछूत पर भी विचार कर लें. हिन्दुओं में आदिकाल से गोत्र व्यवस्था रही है, वर्ण व्यवस्था भी थी, परन्तु जातियाँ नहीं थीं. वेद सम्मत वर्ण व्यवस्था समाज में विभिन्न कार्यों के विभाजन की दृष्टि से लागू थी. यह व्यवस्था जन्म पर आधारित न होकर सीधे-सीधे कर्म (कार्य) पर आधारित थी. कोई भी वर्ण दूसरे को ऊँचा या नीचा नहीं समझता था. उदारणार्थ- अपने प्रारंभिक जीवन में शूद्र कर्म में प्रवृत्त वाल्मीकि जी जब अपने कर्मों में परिवर्तन के बाद पूजनीय ब्राह्मणों के वर्ण में मान्यता पा गए तो वे तत्कालीन समाज में महर्षि के रूप में प्रतिष्ठित हुए. श्री राम सहित चारों भाइयों के विवाह के अवसर पर जब जनकपुर में राजा दशरथ ने चारों दुल्हनों की डोली ले जाने से पहले देश के सभी प्रतिष्ठित ब्राह्मणों को दान और उपहार देने के लिए बुलाया था, तो उन्होंने श्री वाल्मीकि जी को भी विशेष आदर के साथ आमंत्रित किया था.

संभव है, हिंदू समाज में मुसलमानों के आगमन से पहले ही जातियाँ अपने अस्तित्व में आ गयी हों, परन्तु भारत की वर्तमान जातिप्रथा में छुआछूत का जैसा घिनौना रूप अभी देखने में आता है, वह निश्चित रूप से मुस्लिम आक्रान्ताओं की ही देन है. 

कैसे? देखिए-आरम्भ से ही मुसलमानों के यहाँ पर्दा प्रथा अपने चरम पर रही है. यह भी जगजाहिर है कि मुसलमान लड़ाकों के कबीलों में पारस्परिक शत्रुता रहा करती थी. इस कारण, कबीले के सरदारों व सिपाहियों की बेगमे कभी भी अकेली कबीले से बाहर नहीं निकलती थीं. अकेले बाहर निकलने पर इन्हें दुश्मन कबीले के लोगों द्वारा उठा लिए जाने का भय रहता था. इसलिए, ये अपना शौच का काम भी घर में ही निपटाती थीं. उस काल में कबीलों में शौच के लिए जो व्यवस्था बनी हुई थी, उसके अनुसार घर के भीतर ही शौच करने के बाद उस विष्टा को हाथ से उठाकर घर से दूर कहीं बाहर फेंककर आना होता था.

सरदारों ने इस काम के लिए अपने दासों को लगा रखा था. जो व्यक्ति मैला उठाने के काम के लिए नियुक्त था, उससे फिर खान-पान से सम्बंधित कोई अन्य काम नहीं करवाते थे. स्वाभाविक रूप से कबीले के सबसे निकम्मे व्यक्ति को ही विष्ठा उठाने वाले काम में लगाया जाता था. कभी-कभी दूसरे लोगों को भी यह काम सजा के तौर पर करना पड़ जाता था. इस प्रकार, वह मैला उठाने वाला आदमी इस्लामी समाज में पहले तो निकृष्ट/नीच घोषित हुआ और फिर एकमात्र विष्टा उठाने के ही काम पर लगे रहने के कारण बाद में उसे अछूत घोषित कर दिया गया.

वर्तमान में, हिंदू समाज में जाति-प्रथा और छूआछात का जो अत्यंत निंदनीय रूप देखने में आता है, वह इस समाज को मुस्लिम आक्रान्ताओं की ही देन है. आगे इसे और अधिक स्पष्ट करेंगे कि कैसे?

अपने लम्बे संघर्ष के बाद चंद जयचंदों के पाप के कारण जब इस्लाम भारत में अपनी घुसपैठ बनाने में कामयाब हो ही गया, तो बाद में कुतर्क फ़ैलाने में माहिर मुसलमान बुद्धिजीविओं ने घर में बैठकर विष्टा करने की अपनी ही घिनौनी रीत को हिंदू समाज पर थोप दिया और बाद में हिन्दुओं पर जातिवाद और छुआछात फ़ैलाने के उलटे आरोप मढ़ दिए.

यह अकाट्य सत्य है कि मुसलमानों के आने से पहले घर में शौच करने और मैला ढोने की परम्परा सनातन हिंदू समाज में थी ही नहीं. जब हिंदू शौच के लिए घर से निकल कर किसी दूर स्थान पर ही दिशा मैदान के लिए जाया करते थे, तो विष्टा उठाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. जब विष्टा ढोने का आधार ही समाप्त हो जाता है, तो हिंदू समाज में अछूत कहाँ से आ गया? 

हिन्दुओं के शास्त्रों में इन बातों का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि व्यक्ति को शौच के लिए गाँव के बाहर किस दिशा में कहाँ जाना चाहिए तथा कब, किस दिशा की ओर मुँह करके शौच के लिए बैठना चाहिए आदि-आदि.


कमभुवः I (पाराशरo) 
" यदि खुली जगह मिले तो गाँव से नैऋत्यकोण (दक्षिण और पश्चिम के बीच) की ओर कुछ दूर जाएँ."

दिवा संध्यासु कर्णस्थब्रह्मसूत्र उद्न्मुखः I 
कुर्यान्मूत्रपुरीषे तु रात्रौ च दक्षिणामुखः II (याज्ञ o १ I १६, बाधूलस्मृ o ८) 

"शौच के लिए बैठते समय सुबह, शाम और दिन में उत्तर की ओर मुँह करें तथा रात में दक्षिण की ओर "

(सभी प्रमाण जिस नित्यकर्म पूजाप्रकाश, गीताप्रेस गोरखपुर, संवत २०५४, चोदहवाँ संस्करण, पृष्ठ १३ से उद्धृत किये गए हैं, वह पुस्तक एक सामान्य हिंदू के घर में सहज ही उपलब्ध होती है).

इस्लाम की विश्वव्यापी आँधी के विरुद्ध सत्वगुण संपन्न हिंदू समाज के भीषण संघर्ष की गाथा बड़ी ही मार्मिक है.

'दीन' के नाम पर सोने की चिड़िया को बार-लूटने के लिए आने वाले मुसलमानों ने उदार चित्त हिन्दुओं पर बिना चेतावनी दिए ही ताबड़तोड़ हमले बोले. उन्होंने हिंदू ललनाओं के शील भंग किये, कन्याओं को उठाकर ले गए. दासों की मण्डी से आये बर्बर अत्याचारियों ने हारे हुए सभी हिंदू महिला पुरुषों को संपत्ति सहित अपनी लूट की कमाई समझा और मिल-बाँटकर भोगा. हजारों क्षत्राणियों को अपनी लाज बचाने के लिए सामूहिक रूप से जौहर करना पड़ा और वे जीवित ही विशाल अग्नि-कुण्डों में कूद गयीं. 

क्षत्रियों को इस्लाम अपनाने के लिए पीड़ित करते समय घोर अमानवीय यंत्रनाएँ दीं गयीं. जो लोग टूट गए, वे मुसलमान बन जाने से इनके भाई हो गए और अगली लूट के माल में हिस्सा पाने लगे. जो जिद्दी हिंदू अपने मानव धर्म पर अडिग रहे तथा जिन्हें बलात्कारी लुटेरों का साथी बनना नहीं भाया, उन्हें निर्दयता से मार गिराया गया. अपने देश में सोनिया माइनो के कई खास सिपाहसालार तथा मौके को देखकर आज भी तुरंत पाला बदल जाने वाले अनेकानेक मतान्तरित मुसलमान उन्हीं सुविधाभोगी क्षत्रियों की संतानें हैं, जो पहले कभी हिंदू ही थे तथा जिन्होंने जान बचाने के लिए अपने शाश्वत हिंदू धर्म को ठोकर मार दी. उन लोगों ने अपनी हिफाज़त के लिए अपनी बेटियों की लाज को तार-तार हो जाने दिया और उन नर भेड़ियों का साथ देना ही ज्यादा फायदेमंद समझा. बाद में ये नए-नए मुसलमान उन लुटेरों के साथ मिलकर अपने दूसरे हिंदू रिश्तेदारों की कन्याओं को उठाने लगे.

किसी कवि की दो पंक्तियाँ हैं, जो उस काल के हिंदू क्षत्रियों के चरित्र का सटीक चित्रण करती हैं-

जिनको थी आन प्यारी वो बलिदान हो गए,
जिनको थी जान प्यारी, मुसलमान हो गए I 

विषय के विस्तार से बचते हुए, यहाँ, अपनी उस बात को ही और अधिक स्पष्ट करते हैं कि कैसे मुसलमानों ने ही हिन्दुओं में छुआछूत के कलंक को स्थापित किया. अल्लाह के 'दीन' को अपने 'ईमान' से दुनिया भर में पहुँचाने के अभियान पर निकले निष्ठुर कठमुल्लों ने हिंदू को अपनी राह का प्रमुख रोड़ा मान लिया था. इसलिए, उन्होंने अपने विश्वास के प्रति निष्ठावान हिंदू पर बेहिसाब जुल्म ढहाए. आततायी मुसलमान सुल्तानों के जमाने में असहाय हिंदू जनता पर कैसे-कैसे अत्याचार हुए, उन सबका अंश मात्र भी वर्णन कर पाना संभव नहीं है. 

मुसलमानों के अत्याचारों के खिलाफ लड़ने वाले क्षत्रिय वीरों की तीन प्रकार से अलग-अलग परिणतियाँ हुईं.

पहली परिणति-

जिन हिंदू वीरों को धर्म के पथ पर लड़ते-लड़ते मार गिराया गया, वे वीरगति को प्राप्त होकर धन्य हो गए. उनके लिए सीधे मोक्ष के द्वार खुल गए.

दूसरी परिणति-

जो भट्ट, पटेल, मलिक, चौधरी, धर (डार) आदि मौत से डरकर मुसलमान बन गए, उनकी चांदी हो गई. अब उन्हें किसी भी प्रकार का सामाजिक कष्ट न रहा, बल्कि उनका सामाजिक रुतबा पहले से कहीं अधिक बढ़ गया. अब उन्हें धर्म के पक्के उन जिद्दी हिन्दुओं के ऊपर ताल्लुकेदार बनाकर बिठा दिया गया, जिनके यहाँ कभी वे स्वयं चाकरी किया करते थे. उन्हें करों में ढेरों रियायतें मिलने लगीं, जजिये की तो चिंता ही शेष न रही.

तीसरी परिणति-

हज़ार वर्षों से भी अधिक चले हिंदू-मुस्लिम संघर्ष का यह सबसे अधिक मार्मिक और पीड़ाजनक अध्याय है. 

यह तीसरे प्रकार की परिणति उन हिंदू क्षत्रियों की हुई, जिन्हें युद्ध में मारा नहीं गया, बल्कि कैद कर लिया गया. मुसलमानों ने उनसे इस्लाम कबूलवाने के लिए उन्हें घोर यातनाएँ दीं. चूँकि, अपने उदात्त जीवन में उन्होंने असत्य के आगे कभी झुकना नहीं सीखा था, इसलिए सब प्रकार के जुल्मों को सहकर भी उन्होंने इस्लाम नहीं कबूला. अपने सनातन हिंदू धर्म के प्रति अटूट विश्वास ने उन्हें मुसलमान न बनने दिया और परिवारों का जीवन घोर संकट में था, अतः उनके लिए अकेले-अकेले मरकर मोक्ष पा जाना भी इतना सहज नहीं रह गया था.

ऐसी विकट परिस्थिति में मुसलमानों ने उन्हें जीवन दान देने के लिए उनके सामने एक घृणित प्रस्ताव रख दिया तथा इस प्रस्ताव के साथ एक शर्त भी रख दी गई. उन्हें कहा गया कि यदि वे जीना चाहते हैं, तो मुसलमानों के घरों से उनकी विष्टा (टट्टी) उठाने का काम करना पड़ेगा. उनके परिवारजनों का काम भी साफ़-सफाई करना और मैला उठाना ही होगा तथा उन्हें अपने जीवन-यापन के लिए सदा-सदा के लिए केवल यही एक काम करने कि अनुमति होगी.

१९ दिसम्बर १४२१ के लेख के अनुसार, जाफर मक्की नामक विद्वान का कहना है कि ''हिन्दुओं के इस्लाम ग्रहण करने के मुखय कारण थे, मृत्यु का भय, परिवार की गुलामी, आर्थिक लोभ (जैसे-मुसलमान होने पर पारितोषिक, पेंशन और युद्ध में मिली लूट में भाग), हिन्दू धर्म में घोर अन्ध विश्वास और अन्त में प्रभावी धर्म प्रचार।"

इस प्रकार, समय के कुचक्र के कारण अनेक स्थानों पर हजारों हिंदू वीरों को परिवार सहित जिन्दा रहने के लिए ऐसी घोर अपमानजनक शर्त स्वीकार करनी पड़ी. मुसलमानों ने पूरे हिंदू समाज पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति पर काम किया और उन्होंने वीर क्षत्रियों को ही अपना मुख्य निशाना बनाया. मुस्लिम आतंकवाद के पागल हाथी ने हिंदू धर्म के वीर योद्धाओं को परिवार सहित सब प्रकार से अपने पैरों तले रौंद डाला. सभी तरह की चल-अचल संपत्ति पहले ही छीनी जा चुकी थी. घर जला दिए गए थे.

परिवार की क्षत्रिय महिलाओं और कन्याओं पर असुरों की गिद्ध-दृष्टि लगी ही रहती थी. फिर भी, अपने कर्म सिद्धांत पर दृढ़ विश्वास रखने वाले उन आस्थावान हिन्दुओं ने अपने परिवार और शेष हिंदू समुदाय के दूरगामी हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी नियति को स्वीकार किया और पल-पल अपमान के घूँट पीते हुए अपने राम पर अटूट भरोसा रखा. उपासना स्थलों को पहले ही तोड़ दिया गया था, इसलिए उन्होंने अपने हृदय में ही राम-कृष्ण की प्रतिमाएँ स्थापित कर लीं. परस्पर अभिवादन के लिए वेद सम्मत 'नमस्ते' को तिलांजली दे डाली और 'राम-राम' बोलने का प्रचार शुरू कर दिया. समय निकला तो कभी आपस में बैठकर सत्संग भी कर लिया. छुप-छुप कर अपने सभी उत्सव मनाते रहे और सनातन धर्म की पताका को अपने हृदयाकाश में ही लहराते रहे. 

उनका सब कुछ खण्ड-खण्ड हो चुका था, परन्तु, उन्होंने धर्म के प्रति अपनी निष्ठा को लेशमात्र भी खंडित नहीं होने दिया. धर्म परिवर्तन न करने के दंड के रूप में मुसलमानों ने उन्हें परिवारसहित केवल मैला ढोने के एकमात्र काम की ही अनुमति दी थी, पीढ़ी-दर-पीढ़ी वही करते चले गए. कई पीढ़ियाँ बीत जाने पर अपने कर्म में ही ईश्वर का वास समझने वाले उन कर्मनिष्ठ हिन्दुओं के मनो में से नीच कर्म का अहसास करने वाली भावना ही खो गई. अब तो उन्हें अपने अपमान का भी बोध न रहा. 

मुसलमानों की देखा-देखी हिन्दुओं को भी घर के भीतर ही शौच करने में अधिक सुविधा लगने लगी तथा अब वे मैला उठाने वाले लोग हिन्दुओं के घरों में से भी मैला उठाने लगे. इस प्रकार, किसी भले समय के राजे-रजवाड़े मुस्लिम आक्रमणों के कुचक्र में फंस जाने से अपने धर्म की रक्षा करने के कारण पूरे समाज के लिए ही मैला ढोने वाले अछूत और नीच बन गए.

उक्त शोधपरक लेख न तो किसी पंथ विशेष को अपमानित करने के लिए लिखा गया है और न ही दो पंथिक विचारधाराओं में तनाव खड़ा करने के लिए. केवल ऐतिहासिक भ्रांतियों को उजागर करने के लिए लिखे गये इस लेख में प्रमाण सहित घटनाओं की क्रमबद्धता प्रस्तुत की गयी है.

वर्ण और जाति में भारी अंतर है तथा यह लेख मूलतः छूआछूत के कलंक के उदगम को ढूँढने का एक प्रयास है.

मुसलमानों ने मैला ढोने वालों के प्रति अपने परम्परागत आचरण के कारण और उनके हिंदू होने पर उनके प्रति अपनी नफरत व्यक्त करने के कारण उन्हें अछूत माना तथा मुसलमान गोहत्या करते थे, इसलिए मुसलमानों से किसी भी रूप में संपर्क रखने वाले (भले ही उनका मैला ढोने वाले) लोगों को हिंदू समाज ने अछूत माना. इस प्रकार, दलित बन्धु दोनों ही समुदायों के बीच घृणा की चक्की में पिसते रहे.

इस लेख में कहीं भी हिंदू समाज को छूआछूत को बढ़ावा देने के आरोप से मुक्त नहीं किया गया है.

प्रमाण के रूप में कुछ गोत्र प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जो समान रूप से क्षत्रियों में भी मिलते हैं और आज के अपने अनुसूचित बंधुओं में भी. genome के विद्वान् अपने परीक्षण से सहज ही यह प्रमाणित कर सकते हैं कि ये सब भाई एक ही वंशावली से जुड़े हुए हैं. 

उदाहरण- चंदेल, चौहान, कटारिया, कश्यप, मालवण, नाहर, कुंगर, धालीवाल, माधवानी, मुदई, भाटी, सिसोदिया, दहिया, चोपड़ा, राठौर, सेंगर, टांक, तोमर आदि-आदि-आदि.

जरा सोचिये, हिंदू समाज पर इन कथित अछूत लोगों का कितना बड़ा ऋण है. यदि उस कठिन काल में ये लोग भी दूसरी परिणति वाले स्वार्थी हिन्दुओं कि तरह ही तब मुसलमान बन गए होते तो आज अपने देश की क्या स्थिति होती? और सोचिये, आज हिन्दुओं में जिस वर्ग को हम अनुसूचित जातियों के रूप में जानते हैं, उन आस्थावान हिन्दुओं की कितनी विशाल संख्या है, जो मुस्लिम दमन में से अपने राम को सुरक्षित निकालकर लाई है. 

क्या अपने सनातन हिंदू धर्म की रक्षा में इनका पल-पल अपमानित होना कोई छोटा त्याग था? क्या इनका त्याग ऋषि दधिची के त्याग की श्रेणी में नहीं आता?

स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि जब किसी एक हिंदू का मतान्तरण हो जाता है, तो न केवल एक हिंदू कम हो जाता है, बल्कि हिन्दुओं का एक शत्रु भी बढ़ जाता है.
लेखक डॉ. मनोज शर्मा

भारत में प्राचीन और मध्य युग तक घरों में शौचालय नहीं होते थे , सभी जंगल या खेत में शौच के लिए जाते थे, जब शौचालय ही नहीं थे तो उनको साफ़ करने के लिए सफाई कर्मचारी (जमादार) की भी आवश्यकता नहीं थी , मुस्लिम राजाओं के राज में अपहरण करके लाई गयी औरते अक्सर शौच के लिए बाहर जाने के बहाने भाग जाती थीं या खुदकशी कर लेती थीं . तो उनको महल से बाहर जाने से रोकने की खातिर अन्दर ही संडास बनाए जाने लगे , 

लेकिन फिर समस्या आयी कि इस गन्दगी कि सफाई कैसे हो . तो इसका हल ये निकाला गया कि लड़ाई में हारे हुए युद्ध वंदियों को पहले तो धर्मपरिवर्तन के लिए कहा जाता था और धर्म परिवर्तन के लिए न मानने वालों को गंदगी उठाने पर मजबूर किया जाता था , उन हालात में भी बहुतों ने गंदगी उठाना मंजूर किया लेकिन धर्म छोड़ना मंजूर नहीं किया . मुस्लिम राजाओं को खुश करने कि खातिर चापलूस (हिन्दू) लोगों ने उन धर्मनिष्ठ लोगों से दुरी बना ली , साथ ही उनको इस बात का भी डर था कि अगर इन सजा भोग रहे धर्मनिष्ठ लोगों से मेल रखेंगे तो शासक वर्ग नाराज होकर उनको भी प्रताड़ित कर सकता है . 

कालान्तर में यही चीज़ जाति प्रथा और छुआछूत की बजह बन गयी . और इस छुआछूत की बजह से बहुत बड़ी आबादी को घटिया जीवन जीने को मजबूर होना पड़ा . ऐसे ही भारत में लकड़ी की खडाऊं पहनी जाती थी जूते पहनने का रिवाज नहीं था इस लिए चर्मकार भी नहीं थे .

लेख पढ़कर तो यह कहूँगा कि इसमें कोई शक नहीं कि आज जो शूद्र हैं वो वही हिन्दु हैं जो मुसलमानों के अत्याचार से बचने लिए शूद्र बने। इसका प्रमाण ये है कि शूद्र सूअर को पालते हैं।मुसलमान सूअर को घृणित मानते हैं इसलिए हिन्दू सूअर को लेकर अपने साथ लेकर समाज से अलग बस गए ताकि मुसलमान उन पर धर्म-परिवर्तन का दवाब ना बना सके।अब इस बात से मैं यह तो प्रमाणित नहीं कर सकता कि शूद्र मुसलमान से पहले अस्तित्व में थे ही नहीं।वैसे ज्यादा संभावना तो इसी बात कि दिखती है कि मुसलमान के बाद ही मैला ढोने,सूअर पालने जैसे काम करने वाले लोग अस्तित्व में आए।

इस्लामी शासन काल में षड्यंत्रिक TAX ..... और सनातन संस्कारों की हानि

इस्लामी शासन काल में षड्यंत्रिक TAX ..... और सनातन संस्कारों की हानि

by Lovy Bhardwaj 

इस्लामी आक्रमणों के 1200 वर्षों के इतिहास में धर्म की बहुत हानि हुई, सती प्रथा, बाल विवाह, जात पात, आदि जाने कितनी ही सामाजिक बुराइयां सनातन धर्म को छू गयीं, और काने कितनी ही विकृतियाँ सनातन धर्म को चोटिल करती रहीं l ऐसी ही कुछ बुराइयों के बारे में भारत वर्ष की इतिहास की पुस्तकों में पढ़ाया जाता है परन्तु उन्हें पढ़ कर लगता है की वो केवल उपरी ज्ञान हैं, और ज्यादातर बुराइयों को सनातन धर्म से जोड़ कर ही दिखा दिया जाता है, परन्तु ये नहीं बताया जाता की उन बुराइयों के असली कारण क्या थे, और किन कारणों से उन बुराइयों का उदय हुआ और विस्तार हुआ?

सनातन संस्कृति के शास्त्रों के अनुसार में मनुष्यों को 16 संस्कारों के साथ अपना जीवन व्यतीत करने का आदेश दिया गया है, जिनके नियम और उद्देश्य अलग अलग हैं l इस्लामी आक्रमणों से पहले तक संस्कार प्रथा अपने नियमो के अनुसार निरंतर आगे बढ़ रही थी, परन्तु इस्लामी आक्रमणों के बाद और सफलतम अंग्रेजी स्वप्न्कार Lord McCauley ने संस्कार पद्धतियों को सनातन संस्कृति से पृथक सा ही कर दिया l

यदि सही शब्दों में कहूं तो शायाद संस्कार प्रथा लुप्तप्राय सी ही हो चुकी है l इस्लामी शासनों के कार्यकालों में किस प्रकार संस्कारों में कमी हुई इसके बारे में आप सबको कुछ बताना चाहता हूँ, कृपया ध्यान से पढ़ें और सबको पढ़ा कर जागरूक करें .... आप सबने इस्लामी शासन कालों में जजिया और महसूल के बारे में ही सुना होगा ....

परन्तु सोचने वाली बात है की क्या इस्लामी मानसिकता के अनुसार हिन्दुओं पर धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने हेतु ये दो ही कर (TAX) काफी थे... ये सोचना ही हास्यापद होगा l इस्लामी शासन कालों में समस्त 16 संस्कारों पर TAX लगाया जाता था, जिसको की नेहरु, प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहासकारों ने भारतीय शिक्षा पद्धति की इतिहास की पुस्तकों में जगह नहीं दी l ऐसे और भी बहुत से विषय हैं जिन पर यह बहस की जा सकती है, परन्तु वो किसी और दिन करेंगे l

अरब से जब इस्लामी आक्रमण प्रारम्भ हुए तो अपनी क्रूरता, वेह्शीपन, आक्रामकता, दरिंदगी, इरान, मिस्र, तुर्की, इराक, आदि सब विजय करते हुए सनातन संस्कृति को समाप्त करने मलेच्छों द्वारा ऋषि भूमि देव तुल्य अखंड भारत पर आक्रमण किये गए l लक्ष्य केवल एक था.... दारुल हर्ब को ... दारुल इस्लाम बनाने का

और इस लक्ष्य के लिए जिस नीचता पर उतरा जाए वो सब उचित थीं इस्लामी मानसिकता के अनुसार
ऐसी ही नीच मानसिकता के अनुसार जजिया और महसूल जैसे TAXES के बाद सनातन संस्कृति के 16 संस्कारों पर भी TAX लगाया गया l

संस्कारों पर TAX लगाने का मुख्य कारण यह था की सनातन धर्म के अनुयायी TAX के बोझ के कारण अपने संस्कारों से दूर हो जाएँ l धीरे धीरे इस प्रकार के षड्यंत्रों के कारण इस्लामी कट्टरपंथीयों द्वारा अपनाई गयी इस सोच का यह लक्ष्य सिद्ध होता गया l

धीरे धीरे समय ऐसा भी आया की कुछ लोग केवल आवश्यक संस्कारों को ही करवाने लगे, और कुछ लोग संस्कारों से पूर्णतया कट से गए l

सबसे पहले आता है गर्भाधान संस्कार .....

किसी सनातन धर्म की स्त्री द्वारा जब गर्भ धारण किया जाता था तो एक निश्चित TAX इलाके के मौलवी या इमाम के पास जमा किया जाता था और उसकी एक रसीद भी मिलती थी l यदि उस TAX को दिए बिना किसी भी सनातन धर्म के अनुसायी के घर में कोई सन्तान उत्पन्न होती थी तो उसे इस्लामी सैनिक उठा कर ले जाते थे और उसकी इस्लामी नियमो के अनुसार सुन्नत करके उसे मुसलमान बना दिया जाता था l  

नामकरण संस्कार

नामकरण संस्कार का षड्यंत्र यदि देखा जाए तो सबसे महत्वपूर्ण है ...इस षड्यंत्र  को समझने में

नामकरण संस्कार में जब किसी बच्चे का नाम रखा जाता था तो उन पर विभिन्न प्रकार के के TAX निर्धारित किये गए थे ...

उदाहरण के लिए .... कुंवर व्यापक सिंह ...
इसमें "कुंवर" शब्द एक सम्माननीय उपाधि को दर्शाता है, जो की किसी राजघराने से सम्बन्ध रखता हो, 
उसके बाद "व्यापक" शब्द सनातन संस्कृति के शब्दकोश का एक ऐसा शब्द है जो जब तक चलन में रहेगा तब तक सनातन संस्कृति जीवित रहेगी l
उसके बाद "सिंह"  शब्द आता है .... जो की एक वर्ण व्यवस्था या एक वंशावली का सूचक है l

कुंवर..... पर TAX 10000 रुपये
व्यापक ...पर TAX 1000 रुपये
सिंह ...... पर TAX 1000 रुपये

अब जो TAX चुकाने में सक्षम लोग थे वो अपने अपने बजट के अनुसार अपने बाचों के लिए शुभ नाम निकाल लेते थे l

समस्या वहां उत्पन्न हुई जिनके पास पैसे न हों....
अब आप सोचेंगे की ऐसे बच्चों का कोई नाम नहीं होता होगा .... ?
परन्तु ऐसा नही था ... ऐसे गरीब परिवारों के बच्चों के लिए भी नाम रखे जाने का प्रावधान था l
परन्तु ऐसे नाम उस इलाके के मौलवी या इमाम द्वारा मुफ्त में दिया जाता था और यह कडा नियम था की जो नाम इमाम या मौलवी देंगे वही रखा जायेगा .. अन्यथा दंड का प्रावधान भी होता था l

अब ज़रा सोचिये की किस प्रकार के नाम दिए जाते होंगे इलाके के मौलवी या इमाम द्वारा...

लल्लू राम,
झंडू राम,
कूड़े सिंह,
घासी राम,
घसीटा राम,
फांसी राम,
फुग्ग्न सिंह,
राम कटोरी,
लल्लू सिंह,
फुद्दू राम,
रोंदू सिंह,
रोंदू राम,
रोंदू मल,
खचेडू राम,
खचेडू मल,
लंगडा सिंह,

इस प्रकार के नाम इलाके के मौलवी और इमामो द्वारा मुफ्त में दिए जाते थे l

क्या आप ऐसे नाम अपने बच्चों के रख सकते हैं ... कभी ?? शायद नहीं ?

विवाह संस्कार के लिए  इलाके के मौलवी से स्वीकृति लेनी पडती थी, बरात निकालने, ढोल नगाड़े बजाने पर भी TAX होता था, और बरात किस किस मार्ग से जाएगी यह भी मौलवी या इमाम ही तय करते थे l

और इस्लामिक केन्द्रों के सामने ढोल नगाड़े नहीं बजाये जायेंगे, वहां पर से सर झुका कर जाना पड़ेगा l

वर्तमान समय में असम और पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों में तो यह आम बात है l

अंतिम संस्कार पर तो भारी TAX लगाया जाता था, जिसके कारण यह तक कहा जाता था कि यदि TAX देने का पैसा नहीं है तो इस्लाम स्वीकार करो और कब्रिस्तान में दफना दो l

वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, आजमगढ़, आदि क्षेत्रों में यह आम बात है l
केरल, बंगाल, असम के मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों में खुल्लम खुल्ला यह फरमान सुनाया जाता है, जहां पर प्रशासन और पुलिस द्वारा कोई सहायता नहीं उपलब्ध करवाई जाती l

इस्लामिक शासन काल में सनातन गुरुकुल शिक्षा पद्धति को भी धीरे धीरे नष्ट किया जाने लगा, औरंगजेब के शासनकाल में तो यह खुल्लम खुल्ला फरमान सुनाया गया था कि ...

किस प्रकार हिन्दुओं को मुसलमान बनाना है ?
किस किस प्रकार की यातनाएं देनी हैं ? किस प्रकार औरतों का शारीरिक मान मर्दन करना है ?
किस प्रकार मन्दिरों को ध्वस्त करना है ?
किस प्रकार मूर्तियों का विध्वंस करना है ?
मूर्तियों को तोड़ कर उन पर मल मूत्र का त्याग करके उनको मन्दिर के नीचे ही दबा देना, खासकर मंदिरों की सीढियों के नीचे, और फिर उसी के ऊपर मस्जिद का निर्माण कर दिया जाए l
मन्दिरों के पुजारियों को कटक कर दिया जाए, यदि वे इस्लाम कबूल करें तो छोड़ दिया जाए l
जितने भी गुरुकुल हैं उनको ध्वस्त कर दिया जाए और आचार्यों को तत्काल प्रभाव से मौत के घाट उतार दिया जाए l
गौशालाओं को अपने नियन्त्रण में ले लिया जाए l

कई मन्दिरों को ध्वस्त करते हुए तो वहां पर गाय काटी जाती थी l

वर्तमान समय में औरंगजेब के खुद के हाथों से लिखे ऐसे हस्तलेख हैं ..जिन पर उसके दस्तखत भी हैं l

ऐसे अत्याचारों और दमन के कारण उपनयन जैसा अति महत्वपूर्ण संस्कार भी विलुप्ति कि कगार पर पहुँचने लगा l

धीरे धीरे संस्कारों का यह सिलसिला ख़त्म सा होता चला गया, वानप्रस्थ और सन्यास संस्कारों को तो लोग भूल ही गए क्योंकि उनका अर्थ ही नहीं ज्ञात हो पाया आने वाली कई पीढ़ियों को l

छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा एक बार पंजाब क्षेत्र में Survey करवाया गया था जिसके अनुसार पंजाब के कई क्षेत्र ऐसे थे जहां पर लोग गायत्री महामंत्र भी भूल चुके थे, उन्हें उसका उच्चारण तो क्या इसके बारे में पता ही नहीं था l

धीरे धीरे पंजाब और अन्य क्षेत्रों में छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा उध्वस्त मन्दिरों का निर्माण करवाया गया और कई जगहों पर आचार्यों को भेजा गया जिन्होंने धर्म प्रचार एवं प्रसार के कार्य किये l

एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है ....

कृपया ध्यान से पढ़ें और समझें एक अनोखी कहानी जो भुला दी गयी  SECULAR  भारतीय इतिहासकारों द्वारा और नेहरु की kangres द्वारा

औरंगजेब की मृत्यु के 10 वर्ष के अंदर अंदर ही मुगलिया सल्तनत मिटटी में मिल चुकी थी, रंगीले शाह अपनी रंगीलियों के लिए प्रसिद्ध था और दिन प्रतिदिन मुगलिया सल्तनत कर्जों में डूब रही थी l रंगीले शाह को कर्ज देने में सबसे आगे जयपुर के महाराजा था l एक बार मौका पाकर जयपुर के महाराजा ने अपना कर्जा मांग लिया l रंगीले शाह ने बुरे समय पर जयपुर के महाराजा से सम्बन्ध खराब करना उचित न समझा, क्योंकि आगे के लिए कर्ज मिलना बंद हो सकता था जयपुर के महाराज से.. परन्तु रंगीले शाह ने जयपुर के महाराजा की रियासतों को बढ़ा कर बहुत ही ज्यादा विस्तृत कर दिया और कहा की जो नए क्षेत्र आपको दिए गए हैं आप वहां से अपना कर वसूलें जिससे की कर्ज उतर जाए l जयपुर के महाराज के प्रभाव क्षेत्र में अब गंगा किनारे ब्रिजघाट, आगरा, बिजनौर, सहारनपुर, पानीपत, सोनीपत आदि बहुत से क्षेत्र भी सम्मिलित हो गए l इन क्षेत्रों में संस्कारों के ऊपर लगने वाले TAX .. जजिया और महसूल आदि धार्मिक TAXES के कारण जनता त्राहि त्राहि कर रही थी, और जयपुर के महाराजा के प्रभाव क्षेत्र में आने के कारण सनातन धर्मी अपनी आशाएं लगा कर बैठे थे की अब यह पैशाचिक TAXES का सिलसिला बंद होगा l परन्तु जयपुर के महाराजा ने TAXES वापिस नहीं लिए l

मराठा साम्राज्य के पेशवा के राजदूत दीना नाथ शर्मा उन दिनों जयपुर में नियुक्त थे, उन्होंने भरतपुर के जाट नेता बदनसिंह की मदद की और जाटों की अपनी ही एक सेना बनवा डाली, जिनको पेशवा द्वारा मान्यता भी दिलवा दी गयी और 5000 की मनसबदारी भी दिलवा दी गयी l धीरे धीरे बदनसिंह ने अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया और दीना नाथ शर्मा के कहने पर समस्त जगहों से मुस्लिम TAXES से पाबंदी हटवाने लगे l जयपुर के महाराजा निसहाय हो गए क्योंकि पेशवा से सीधे टकराव उनके लिए सम्भव नहीं था l

इन्हीं दिनों ब्रिजघाट तक का क्षेत्र जाटों द्वारा मुक्त करवा लिया गया ..जिसका नाम रखा गया  गढ़मुक्तेश्वर
बदन सिंह और राजा सूरजमल ने बहुत से क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित किया और मुस्लिम अत्याचारों से मुक्ति दिलवाने का कार्य किया l

फिर भी ऐसी समस्याएं यदा कडा सामने आ ही जाती थीं, की कई कई जगहों पर मुस्लिम लोग हिन्दुओं को घेरकर उनसे TAX लेते थे या फिर संस्कारों के कार्यों में विघ्न पैदा करते थे l इस समस्या से निपटने के लिए आगे चल कर बदनसिंह के बाद राजा सूरजमल ने गंगा-महायज्ञ का आयोजन किया, जिसमे गंगोत्री से 11000 कलश मंगवाए गए गंगा जल के और उन्हें भरतपुर के पास ही सुजान गंगा के नाम से स्थापित करवाया और सभी देवी देवताओं को स्थापित करवाया गया और बहुत से मन्दिरों का निर्माण करवाया गया l

सुजान गंगा पर आने वाले कई  वर्षों तक संस्कारों के कार्य होते रहे l 1947 के बाद नेहरु और SECULAR जमात ने मिल कर सुजान गंगा का अस्तित्व समाप्त कर दिया, उसमे आसपास के सारे गंदे नाले मिलवा दिए और आसपास की फेक्टरियों का गंदा पानी आदि उसमे गिरवा दिया l आसपास के लोग मल-मूत्र त्याग करने लगे l इसी वर्ष हुए एक सर्वे के अनुसार सुजान गंगा के चारों और 650 से ज्यादा लोगों द्वारा प्रतिदिन मल-मूत्र त्याग किया जाता है l

आप सबसे विनम्र अनुरोश है की अपने इतिहास को जानें, जो की आवश्यक है की अपने पूर्वजों के इतिहास जो जानें और समझने का प्रयास करें.... उनके द्वारा स्थापित किये गए सिद्धांतों को जीवित रखें l

जिस सनातन संस्कृति को जीवित रखने के लिए और अखंड भारत की सीमाओं की सीमाओं की रक्षा हेतु  हमारे असंख्य पूर्वजों ने अपने शौर्य और पराक्रम से अनेकों बार अपने प्राणों तक की आहुति दी गयी हो, उसे हम किस प्रकार आसानी से भुलाते जा रहे हैं l

सीमाएं उसी राष्ट्र की विकसित और सुरक्षित रहेंगी ..... जो सदैव संघर्षरत रहेंगे l

जो लड़ना ही भूल जाएँ वो न स्वयं सुरक्षित रहेंगे न ही अपने राष्ट्र को सुरक्षित बना पाएंगे l

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