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Hinduism is the Only Dharma in this multiverse comprising of Science & Quantum Physics.

Josh Schrei helped me understand G-O-D (Generator-Operator-Destroyer) concept of the divine that is so pervasive in the Vedic tradition/experience. Quantum Theology by Diarmuid O'Murchu and Josh Schrei article compliments the spiritual implications of the new physics. Thanks so much Josh Schrei.

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Dhanyabad from Anil Kumar Cheeta

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Friday, September 30, 2011

Goddess Bhadrakali in the form of the Mother - Mandhachaleswari in the temple of Thirumandham Kunnilamma

Goddess Bhadrakali in the form of the Mother - Mandhachaleswari in the temple of Thirumandham Kunnilamma




आज़ादी आंदोलन के प्रेरणा पुरुष लाला लाजपत राय by चेतना प्रवाह

आज़ादी आंदोलन के प्रेरणा पुरुष लाला लाजपत राय
by चेतना प्रवाह


भारत की आजादी के आन्दोलन के प्रखर नेता लाला लाजपत राय का नाम ही देशवासियों में स्फूर्ति तथा प्रेरणा का संचार कराता है। अपने देश धर्म तथा संस्कृति के लिए उनमें जो प्रबल प्रेम तथा आदर था उसी के कारण वे स्वयं को राष्ट्र के लिए समर्पित कर अपना जीवन दे सके। भारत को स्वाधीनता दिलाने में उनका त्याग, बलिदान तथा देशभक्ति अद्वितीय और अनुपम थी। उनके बहुविधि क्रियाकलाप में साहित्य-लेखन एक महत्वपूर्ण आयाम है। वे ऊर्दू तथा अंग्रेजी के समर्थ रचनाकार थे। लालाजी का जन्म 28 जनवरी, 1865 को अपने ननिहाल के गाँव ढुंढिके (जिला फरीदकोट, पंजाब) में हुआ था। 


उनके पिता लाला राधाकृष्ण लुधियाना जिले के जगराँव कस्बे के निवासी अग्रवाल वैश्य थे। लाला राधाकृष्ण अध्यापक थे। लाजपतराय की शिक्षा पाँचवें वर्ष में आरम्भ हुई। 1880 में उन्होंने कलकत्ता तथा पंजाब विश्वविद्यायल से एंट्रेंस की परीक्षा एक वर्ष में पास की और आगे पढऩे के लिए लाहौर आये। यहाँ वे गर्वमेंट कालेज में प्रविष्ट हुए और 1982 में एफ0 ए0 की परीक्षा तथा मुख्यारी की परीक्षा साथ-साथ पास की। यहीं वे आर्यसमाज के सम्पर्क में आये और उसके सदस्य बन गये। लाला साँईदास आर्यसमाज के प्रति इतने अधिक समर्पित थे कि वे होनहार नवयुवकों को इस संस्था में प्रविष्ट करने के लिए सदा तत्पर रहते थे। स्वामी श्रद्धानन्द (तत्कालीन लाला मुंशीराम) को आर्यसमाज में लाने का श्रेय भी उन्हें ही है। 30 अक्टूबर, 1883 को जब अजमेर में ऋषि दयानन्द का देहान्त हो गया तो 9 नवम्बर, 1883 को लाहौर आर्यसमाज की ओर एक शोकसभा का आयोजन किया गया। इस सभा के अन्त में यह निश्चित हुआ कि स्वामी जी की स्मृति में एक ऐसे महाविद्यालय की स्थापना की जाये जिसमें वैदिक साहित्य, संस्कृति तथा हिन्दी की उच्च शिक्षा के साथ-साथ अंग्रेजी और पाश्चात्य ज्ञान -विज्ञान में भी छात्रों को दक्षता प्राप्त कराई जाये। 1886 में जब इस शिक्षण की स्थापना हुई तो आर्यसमाज के अन्य नेताओं के साथ लाला लाजपतराय का भी इसके संचालन में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा तथा वे कालान्तर में डी0ए0वी0 कालेज, लाहौर के महान स्तम्भ बने।

वकालत के क्षेत्र में :- लाला लाजपतराय ने एक मुख्तार (छोटा वकील) के रूप में अपने मूल निवासस्थल जगराँव में ही वकालत आरम्भ कर दी थी; किन्तु यह कस्बा बहुत छोटा था, जहाँ उनके कार्य के बढऩे की अधिक सम्भावना नहीं थी, अत: वे रोहतक चले गये। रोहतक में 1885 में वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की, 1886 में वे हिसार आ गये। एक सफल वकील के रूप में 1892 तक वे यहीं रहे और इसी वर्ष लाहौर आये। तब से लाहौर ही उनकी सार्वजनिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया। लालाजी ने अपने साथियों सहित सामाजिक हित की योजनाओं के कार्यान्वयन में योगदान किया किन्तु लाहौर आने पर वे आर्यसमाज के अतिरिक्त राजनैतिक आन्दोलन के साथ भी जुड़ गये। 1888 में वे प्रथम बार कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन में सम्मिलित हुए जिनकी अध्यक्षता मि0 जार्ज यूल ने की थी। 1906 में वे प0 गोपालकृष्ण गोखले के साथ कांग्रेस के एक शिष्टमण्डल के सदस्य के रूप में इंग्लैड गये। यहाँ से वे अमेरिका चले गये। उन्होंने कई बार विदेश यात्राएँ की और वहाँ रहकर पश्चिमी देशों के समक्ष भारत की राजनैतिक परिस्थिति की वास्तविकता से वहां के लोगों को परिचित कराया तथा उन्हें स्वाधीनता आन्दोलन की जानकारी दी। लाला लाजपतराय ने अपने सहयोगियों-लोकमान्य तिलक तथा विपिनचन्द्र पाल के साथ मिलकर कांग्रेस में उग्र विचारों का प्रवेश कराया। 1885 में अपनी स्थापना से लेकर लगभग बीस वर्षो तक कांग्रेस ने एक राजभवन संस्था का चरित्र बनाये रखा था। इसके नेतागण वर्ष में एक बार बड़े दिन की छुट्टियों में देश के किसी नगर में एकत्रित होने और विनम्रता पूर्वक शासनों के सूत्रधारों (अंग्रेजी) से सरकारी उच्च सेवाओं में भारतीयों को अधिकाधिक संख्या में प्रविष्ट युगराज के भारत-आगमन पर उनका स्वागत करने का प्रस्ताव आया तो लालाजी ने उनका डटकर विरोध किया। कांग्रेस के मंच ये यह अपनी किस्म का पहला तेजस्वी भाषण हुआ जिसमें देश की अस्मिता प्रकट हुई थी। 1907 में जब पंजाब के किसानों में अपने अधिकारों को लेकर चेतना उत्पन्न हुई तो सरकार का क्रोध लालाजी तथा सरदार अजीतसिंह (शहीद भगतसिंह के चाचा) पर उमड़ पड़ा और इन दोनों देशभक्त नेताओं को देश से निर्वासित कर उन्हें पड़ोसी देश बर्मा के मांडले नगर में नजरबंद कर दिया, किन्तु देशवासियों द्वारा सरकार के इस दमनपूर्ण कार्य का प्रबल विरोध किये जाने पर सरकार को अपना यह आदेश वापस लेना पड़ा। लालाजी पुन: स्वदेश आये और देशवासियों ने उनका भावभीना स्वागत किया। लालाजी के राजनैतिक जीवन की कहानी अत्यन्त रोमांचक तो है ही, भारतीयों को स्वदेश-हित के लिए बलिदान तथा महान् त्याग करने की प्रेरणा भी देती है।

जन-सेवा के कार्य :- लालाजी केवल राजनैतिक नेता और कार्यकर्ता ही नहीं थे। उन्होंने जन सेवा का भी सच्चा पाठ पढ़ा था। जब 1896 तथा 1899 (इसे राजस्थान में छप्पन का अकाल कहते हैं, क्योंकि यह विक्रम का 1956 का वर्ष था) में उत्तर भारत में भयंकर दुष्काल पड़ा तो लालाजी ने अपने साथी लाला हंसराज के सहयोग से अकालपीडि़त लोगों को सहायता पहुँचाई। जिन अनाथ बच्चों को ईसाई पादरी अपनाने के लिए तैयार थे और अन्तत: जो उनका धर्म-परिवर्तन करने के इरादे रखते थे उन्हें इन मिशनरियों के चुंगुल से बचाकर फीरोजपुर तथा आगरा के आर्य अनाथलायों में भेजा। 1905 में कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में भयंकर भूकम्प आया। उस समय भी लालाजी सेवा-कार्य में जुट गये और डी0ए0वी0 कालेज लाहौर के छात्रों के साथ भूकम्प-पीडि़तों को राहत प्रदान की।

1907-08 में उड़ीसा मध्यप्रदेश तथा संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) से भी भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा और लालाजी को पीडितों की सहायता के लिए आगे आना पड़ा। पुन: राजनैतिक आन्दोलन में 1907 के सूरत के प्रसिद्ध कांग्रेस अधिवेशन में लाला लाजपतराय ने अपने सहयोगियों के द्वारा राजनीति में गरम दल की विचारधारा का सूत्रपात कर दिया था और जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गये थे कि केवल प्रस्ताव पास करने और गिड़गिड़ाने से स्वतंत्रता मिलने वाली नहीं है। हम यह देख चुके हैं कि जनभावना को देखते हुए अंग्रेजों को उनके देश-निर्वासन को रद्द करना पड़ा था। वे स्वदेश आये और पुन: स्वाधीनता के संघर्ष में जुट गये। प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) के दौरान वे एक प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य के रूप में पुन: इंग्लैंड गये और देश की आजादी के लिए प्रबल जनमत जागृत किया। वहाँ से वे जापान होते हुए अमेरिका चले गये और स्वाधीनता-प्रेमी अमेरिकावासियों के समक्ष भारत की स्वाधीनता का पथ प्रबलता से प्रस्तुत किया। यहाँ इण्डियन होम रूल लीग की स्थापना की तथा कुछ ग्रन्थ भी लिखे। 20 फरवरी, 1920 को जब वे स्वदेश लौटे तो अमृतसर में जलियावाला बाग काण्ड हो चुका था और सारा राष्ट्र असन्तोष तथा क्षोभ की ज्वाला में जल रहा था। इसी बीच महात्मा गांधी ने सहयोग आन्दोलन आरम्भ किया तो लालाजी पूर्ण तत्परता के साथ इस संघर्ष में जुट गये। 1920 में ही वे कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष बने। उन दिनों सरकारी शिक्षण संस्थानों के बहिस्कार विदेशी वस्त्रों के त्याग, अदालतों का बहिष्कार, शराब के विरुद्ध आन्दोलन, चरखा और खादी का प्रचार जैसे कार्यक्रमों को कांग्रेस ने अपने हाथ में ले रखा था, जिसके कारण जनता में एक नई चेतना का प्रादुर्भाव हो चला था।

इसी समय लालाजी को कारावास का दण्ड मिला, किन्तु खराब स्वास्थ्य के कारण वे जल्दी ही रिहा कर दिये गये। 1924 में लालाजी कांग्रेस के अन्तर्गत ही बनी स्वराज्य पार्टी में शामिल हो गये और केन्द्रीय धारा सभा (सेंटल असेम्बली) के सदस्य चुन लिए गये। जब उनका पं0 मोतीलाल नेहरू से कतिपय राजनैतिक प्रश्नों पर मतभेद हो गया तो उन्होंने नेशनलिस्ट पार्टी का गठन किया और पुन: असेम्बली में पहुँच गये। अन्य विचारशील नेताओं की भाँति लालाजी भी कांग्रेस में दिन-प्रतिदिन बढऩे वाली मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से अप्रसन्नता अनुभव करते थे, इसलिए स्वामी श्रद्धानन्द तथा पं0 मदनमोहन मालवीय के सहयोग से उन्होंने हिन्दू महासभा के कार्य को आगे बढ़ाया। 1925 में उन्हें हिन्दू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष भी बनाया गया। ध्यातव्य है कि उन दिनों हिन्दू महासभा का कोई स्पष्ट राजनैतिक कार्यक्रम नहीं था और वह मुख्य रूप से हिन्दू संगठन, अछूतोद्धार, शुद्धि जैसे सामाजिक कार्यक्रमों में ही दिलचस्पी लेती थी। इसी कारण कांग्रेस से उसे थोड़ा भी विरोध नहीं था। यद्यपि संकीर्ण दृष्टि से अनेक राजनैतिक कर्मी लालाजी के हिन्दू महासभा में रुचि लेने से नाराज भी हुए किन्तु उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की और वे अपने कर्तव्यपालन में ही लगे रहे।

जीवन संध्या 1928 में जब अंग्रेजों द्वारा नियुक्त साइमन भारत आया तो देश के नेताओं ने उसका बहिस्कार करने का निर्णय लिया। 30 अक्टूबर, 1928 को कमीशन लाहौर पहुँचा तो जनता के प्रबल प्रतिशोध को देखते हुए सरकार ने धारा 144 लगा दी। लालाजी के नेतृत्व में नगर के हजारों लोग कमीशन के सदस्यों को काले झण्डे दिखाने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँचे और ‘साइमन वापस जाओÓ के नारों से आकाश गुँजा दिया। इस पर पुलिस को लाठीचार्ज का आदेश मिला। उसी समय अंग्रेज सार्जेंट साण्डर्स ने लालाजी की छाती पर लाठी का प्रहार किया जिससे उन्हें सख्त चोट पहुँची। उसी सायं लाहौर की एक विशाल जनसभा में एकत्रित जनता को सम्बोधित करते हुए नरकेसरी लालाजी ने गर्जना करते हुए कहा-मेरे शरीर पर पडी़ लाठी की प्रत्येक चोट अंग्रेजी साम्राज्य के कफन की कील का काम करेगी। इस दारुण प्रहात से आहत लालाजी ने अठारह दिन तक विषम ज्वर पीड़ा भोगकर 17 नवम्बर 1928 को परलोक के लिए प्रस्थान किया।

साभार : चेतना प्रवाह

About Vrndavan Brannon Parker


About Vrndavan Brannon Parker

Vrndavan Brannon Parker is a Vedic researcher and historian. He has contributed essays to multiple publications for more than ten years and specializes in multi-media presentations with a focus on generating the interest and attention of the general public.

Vrndavan attended Vedic Gurukula schools for 10 years where he studied Sanskrit, Hindi, Puranas, Upanishads, Bhagavad-Gita, Indian History, Math and English. He attended Bhaktivedanta Gurukula in Vrindavan, India (Uttar Pradesh) from the age of 9 to 12. He received direct Harinam initiation from Srila A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada on Oct 23, 1977 and the Gayatri Mantra from Srila Bhakti Sundar Govinda Maharaj of the Caitanya Saraswat Math in 1992. 

His experiences from a young age imprinted him in such a way that he has always held a deep seated interest in and been connected to Indian history and culture. This led him to the inception of his own production and research company, Vedic Empire, founded in 1996.

Vrndavan has been researching and publicly presenting papers on Vedic historical and cross-cultural connections since 1996. His main focus has been on highlighting the similarities between the ancient cultures and civilizations around the world and defining their Vedic roots. Vrndavan stresses the importance of recognizing Hinduism as the world's longest and most contiguous ancient culture stemming from the Vedic scriptures. He has written numerous essays on the subject and firmly states his opinion that Hinduism and Vedic knowledge and practices hold the key to solving many global problems on a social, economic, ecological, political, and religious level.

Vrndavan dedicates his time to working with organizations that promote Vedic Dharma. He holds the distinction as a founding member of WAVES (World Association for Vedic Studies), VFA (Vedic Friends Association) and AVA, the Latin American branch of VFA. Vrndavan is also a Co-founder of Arise Arjuna Foundation and is a member of the Indian-American Friendship Council.

He is also the author of 'Orissa in the Crossfire-Kandhamal Burning', 'Harvest of Hate-Kandhamal in Crossfire' and the soon to be published 'The Serpent, the Eagle, the Lion and the Disc'.


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Wednesday, September 28, 2011

Matho Mathis || Enter The World Of Binaries: Color and Speed Of Light - Vedic Science

Matho Mathis || Enter The World Of Binaries: Color and Speed Of Light - Vedic Science: Vedic science is a great treasure of knowledge in the form of Vedas, Upanishads & Samhitas. Ancient Rishis proved the various scientific the...

Color and Speed Of Light - Vedic Science
Vedic science is a great treasure of knowledge in the form of Vedas, Upanishads & Samhitas. Ancient Rishis proved the various scientific theories based on Vedic science; since more than thousands of year ago.

In Vedic literature, there are so many verses that explain the theory of universe, Astrology, Engineering, Medicine, Telegraphy, Metallurgy, Chemistry and Life sciences. We should regretful to great rishis who founded a root of knowledge in form of Vedas & Upanishads and scattered this knowledge across the world.

Religion and science both search for logical reasons for the existence of divine universe & life. The Sanskrit meaning of word Veda is “unite - that which is given " OR UNIFICATION, and Rig means logic or reason, hence Rig-Veda stands for UNIFICATION BY LOGIC. All verses of Rig Veda are given in logical manner. Each verse is a complete holistic theorem in itself and contains a numerical solution to the mathematical theorem imbedded in the descriptive wording .


In Rig veda, light is explained as a sorce of energy or source of our life. Nature of light as a wave or as a particle was not come into picture till late into the modern age, but in Rig Veda it is clearly mentioned that

"Seven horses draw the chariot of the sun, tied by snakes". Rig-veda 5. 45. 9



Above poetic verse speaks about the nature of light as being composed of 7 rays and the snake symbolizes it's curved path. Now, these colors are actually described as red, orange, yellow, green, blue, Indigo and violet in the yoga sutras and the Vedic Upanishads.

These colors was not discovered in western science till
Newton (4 January 1643 – 31 March 1727 ) experimented to split light into it's 7 colors by a prism.



Speed of light according to Rig-Veda:



The speed of light, (defined as 299 792 458metres/s) is a universal constant which was often believed to be impossible to breach. However it is now known that the speed of light is approximately 41.7 miles an hour (sometimes inaccurately rounded up to 42 m/h).The simplest and most successful attempt to measure the speed of light was performed by Max Planck, Different physicists have tried to measure the speed of light throughout history.

Galileo attempted to measure the speed of light in the seventeenth century. An early experiment to measure the speed of light was conducted by Ole Rømer, a Danish physicist, in 1676. Rømer calculated that light takes about 22 minutes to traverse the diameter of Earth's orbit. Unfortunately, its size was not known at that time. If Ole had known the diameter of the Earth's orbit, he would have calculated a speed of 227,000,000 m/s.

In Rigveda, following sloka’s state about the speed of light which is nearly about of modern value of 186,282.397 miles / seconds:

“Yojananam Dwe Dwe Shate Dwe Cha Yojane
Aken Nimishardhena Krammana Namostute” (Rig-veda I,50-4)


In the verse Sun light speed is measured with the help of units called Yojan & Nimesha.This verse explain that sunlight moves 2202 Yojans in Half Nimish.



Taranir Vishvadarshato Jyotishkrdasi Surya |
Vishvamaa Bhaasirochanam ||

Meaning:
Oh Sun! (You) overwhelm all in speed, visible to all, source of light. (You) shine pervading the Universe.

Rigvedic commentary, Sayanacarya who was a minister in the court of Bukka of the great Vijayanagar Empire of Karnataka in South India (in early 14th century) says:



Tatha Ca Smaryate Yojananam. Sahasre Dve Dve Sate Dve Ca Yojane
Ekena Nimishardhena Kramaman.

Meaning :

“It is remembered here that Sun (light) traverses 2,202 yojanas in half a nimisha”


Sayanacarya’s Calculation for Speed of light (The commentary on the Rig-veda by Sayana (c. 13 15-1387), a minister and scholar par excellence in the court of King Bukka I of the Vijayanagar Empire in South India):

In the Vedas, Yojana is a unit of distance and Nimisha is a unit of time.

Distance travelled =2202 Yojanas

1 Yojana = 9 miles, 110 Yards =21,144.705 miles (Apprx)

Time taken 1/2 nimesha = 0.114286 seconds(Apprx)

Speed of light= 185,016.169 miles / seconds.

Modern Value= 186,282.397 miles / seconds.
Modern science claims the speed of light to be aproximately 186,282.397 miles / seconds

This Sukta is attributed to the son of Kanva Maharshi and is prescribed for use in two different occasions - in Suryeshti sacrifice (a ritual to please the Sun God)


Unit of Time: Nimesa

Nimesa Definition as per Moksha dharma parva of Shanti Parva in Mahabharata

15 Nimisha = 1 Kastha
30 Kashta = 1 Kala
30.3 Kala = 1 Muhurta
30 Muhurtas = 1 Diva-Ratri (Day-Night) One Day-Night = 24 hours

Unit of Distance: Yojana

Yojana Definition as per “Vishnu Purana”

10 ParamAnus = 1 Parasúkshma
10 Parasúkshmas = 1 Trasarenu
10 Trasarenus = 1 Mahírajas 10 Mahírajas= 1 Bálágra 10 Bálágra = 1 Likhsha 10 Likhsha= 1 Yuka 1o Yukas = 1 Yavodara 10 Yavodaras = 1 Yava 10 Yava = 1 Angula

6 fingers = 1 Pada
2 Padas = 1 Vitasti

2 Vitasti = 1 Hasta
4 Hastas = a Dhanu, a Danda, or pauruSa (a man’s height), or 2 Nárikás = 6 feet

2000 Dhanus = 1 Gavyuti = 12000 feet
4 Gavyutis = 1 Yojana = 9.09 miles

Now, you may also want to read...

Color and speed of light || continued



It says sun light travels 2202 Yojanas in a half Nimesa. Yojana is an ancient unit of length. Arthasastra defines it as being equal to 8,000 dhanus, which is equivalent to 9 miles. A nimesa is an ancient unit of time that is equal to 16/75 seconds.

Matho Mathis || Enter The World Of Binaries: Taj Mahal =Tejo Mahalaya ? : Truth Behind Taj Maha...

Matho Mathis || Enter The World Of Binaries: Taj Mahal =Tejo Mahalaya ? : Truth Behind Taj Maha...: The world famous Tajmahal is a glaring instance. For all the time, money and energy that people over the world spend in visiting the Tajmaha...

Taj Mahal =Tejo Mahalaya ? : Truth Behind Taj Mahal - Part 1

The world famous Tajmahal is a glaring instance. For all the time, money and energy that people over the world spend in visiting the Tajmahal, they are dished out of concoction. Contrary to what visitors are made to believe the Tajmahal is not a Islamic mausoleum but an ancient Shiva Temple known as Tejo Mahalaya which the 5th generation moghul emperor Shahjahan commandeered from the then Maharaja of Jaipur.

The Tajmahal, should therefore, be viewed as a temple palace and not as a tomb. That makes a vast difference. You miss the details of its size, grandeur, majesty and beauty when you take it to be a mere tomb. When told that you are visiting a temple palace you wont fail to notice its annexes, ruined defensive walls, hillocks, moats, cascades, fountains, majestic garden, hundreds of rooms archaded verendahs, terraces, multi stored towers, secret sealed chambers, guest rooms, stables, the trident (Trishul) pinnacle on the dome and the sacred, esoteric Hindu letter "OM" carved on the exterior of the wall of the sanctum sanctum now occupied by the cenotaphs.

Let us start with a some points and try to cover as much as possible in subsequent chapters/articles:

NAME:

1. The term Tajmahal itself never occurs in any mogul court paper or chronicle even in Aurangzeb's time. The attempt to explain it away as Taj-i-mahal.

2. The ending "Mahal"is never muslim because in none of the muslim countries around the world from Afghanistan to Algeria is there a building known as "Mahal".

3. The unusual explanation of the term Tajmahal derives from Mumtaz Mahal, who is buried in it, is illogical in at least two respects viz., firstly her name was never Mumtaj Mahal but Mumtaz-ul-Zamani and secondly one cannot omit the first three letters "Mum" from a woman's name to derive the remainder as the name of the building.

4. Since the lady's name was Mumtaz (ending with 'Z') the name of the building derived from her should have been Taz Mahal, if at all, and not Taj (spelled with a 'J').

5. Several European visitors of Shahjahan's time allude to the building as Taj-e-Mahal is almost the correct tradition, age old Sanskrit name Tej-o-Mahalaya, signifying a Shiva temple. Contrarily Shahjahan and Aurangzeb scrupulously avoid using the Sanskrit term and call it just a holy grave.

6. The tomb should be understood to signify NOT A BUILDING but only the grave or cenotaph inside it. This would help people to realize that all dead muslim courtiers and royalty including Humayun, Akbar, Mumtaz, Etmad-ud-Daula and Safdarjang have been buried in capture Hindu mansions and temples.

7. Moreover, if the Taj is believed to be a burial place, how can the term Mahal, i.e., mansion apply to it?

8. Since the term Taj Mahal does not occur in mogul courts it is absurd to search for any mogul explanation for it. Both its components namely, 'Taj' and' Mahal' are of Sanskrit origin.

TEMPLE TRADITION:

9. The term Taj Mahal is a corrupt form of the sanskrit term Tejo Mahalay signifying a Shiva Temple. Agreshwar Mahadev i.e., The Lord of Agra was consecrated in it.

10.The tradition of removing the shoes before climbing the marble platform originates from pre Shahjahan times when the Taj was a Shiva Temple. Had the Taj originated as a tomb, shoes need not have to be removed because shoes are a necessity in a cemetery.

11. Visitors may notice that the base slab of the cenotaph is the marble basement in plain white while its superstructure and the other three cenotaphs on the two floors are covered with inlaid creeper designs. This indicates that the marble pedestal of the Shiva idol is still in place and Mumtaz's cenotaphs are fake?

12. The pitchers carved inside the upper border of the marble lattice plus those mounted on it number 108-a number sacred in Hindu Temple tradition.

13. There are persons who are connected with the repair and the maintenance of the Taj who have seen the ancient sacred Shiva Linga and other idols sealed in the thick walls and in chambers in the secret, sealed red stone stories below the marble basement. The Archaeological Survey of India is keeping discretely, politely and diplomatically silent about it to the point of dereliction of its own duty to probe into hidden historical evidence.

14.In India there are 12 Jyotirlingas i.e., the outstanding Shiva Temples. The Tejo mahalaya alias The Tajmahal appears to be one of them known as Nagnatheshwar since its parapet is girdled with Naga, i.e., Cobra figures. Ever since Shahjahan's capture of it the sacred temple has lost its Hindudom.

15. The famous Hindu treatise on architecture titled Vishwakarma Vastushastra mentions the 'Tej-Linga' amongst the Shivalingas i.e., the stone emblems of Lord Shiva, the Hindu deity. Such a Tej Linga was consecrated in the Taj Mahal, hence the term Taj Mahal alias Tejo Mahalaya.

16. Agra city, in which the Taj Mahal is located, is an ancient center of Shiva worship. Its orthodox residents have through ages continued the tradition of worshiping at five Shiva shrines before taking the last meal every night especially during the month of Shravan. During the last few centuries the residents of Agra had to be content with worshipping at only four prominent Shiva temples viz., Balkeshwar, Prithvinath, Manakameshwar and Rajarajeshwar. They had lost track of the fifth Shiva deity which their forefathers worshipped. Apparently the fifth was Agreshwar Mahadev Nagnatheshwar i.e., The Lord Great God of Agra, The Deity of the King of Cobras, consecrated in the Tejo mahalay alias Tajmahal.

17. The people who dominate the Agra region are Jats. Their name of Shiva is Tejaji. The Jat special issue of The Illustrated Weekly of India (June 28,1971) mentions that the Jats have the Teja Mandirs i.e., Teja Temples. This is because Teja-Linga is among the several names of the Shiva Lingas. From this it is apparent that the Taj - Mahal is Tejo - Mahalaya, The Great Abode of Tej.

More To Be Continued...
[Sources : Books/websites]

Monday, September 19, 2011

Was the Mughal Emperor, Akbar Really Great ??!! Find out....!!


Was the Mughal Emperor, Akbar Really Great??!! Find out....!!


Introduction: History of India has witnessed innumerable invasions by hoards of armed marauders coming in from the west, perhaps attracted to the riches and wealth India then possessed. Apart from looting of wealth and destruction of property, the 'aliens' who remained, who committed grave atrocities against the local populace, and themselves, wallowing in immoral and unethical behaviour; except for one, it is said, Akbar.
Akbar, the third generation Moghal emperor who lived from 1542-1605 A.D, has been extolled as the greatest of all Moghals, righteous in deed and noble in character. He is praised to be the only and truly secular Emperor of the times, very caring and protective of his subjects. However, assessment and analysis of contemporary notings expose this unjustified edification of Akbar and provides a remarkably different picture of Akbar's personality.

The following is not a comprehensive report on Akbar's reign, but an attempt to provide a summary to the reader, on the real nature of Akbar based on contemporary records. It is hoped that the reader will make a judgement on Akbar's "greatness" based on the information provided below.
Akbar's Ancestors: Akbar's ancestors were barbarous and vicious, and so were his descendants like Aurangzeb and others' down the line. Akbar was born and brought up in a illiterate and foul atmosphere characterized by excessive drinking, womanizing and drug addiction. Vincent Smith in "Akbar - The Great Mogul" (p.294) writes, " Intemperance was the besetting sin of the Timuroid royal family, as it was of many other muslim ruling houses. Babur (was) an elegant toper ... Humayun made himself stupid with opium ... Akbar permitted himself the practices of both vices .. Akbar's two sons died in early manhood from chronic alcoholism, and their elder brother was saved from the same fate by a strong constitution, and not by virtue." With such an atmosphere to nourish Akbar's thoughts, it is rather unsual for Akbar to become "divine incarnate"!

Describing the demoniac pleasure which Babur used to derive by raising towers of heads of people he used to slaughter, Col. Tod writes that after defeating Rana Sanga at Fatehpur Sikri "triumphal pyriamids were raised of the heads of the slain, and on a hillock which overlooked the field of the battle, a tower of skulls was erected and the conquerer Babur assumed the title of Ghazi." (p.246). Akbar seems to have preserved this "great" legacy of erecting minarets as is obvious from the accounts of battles he fought.

Humayun, the son of Babar, was even more degenerate and cruel than his father. After repeated battles, Humayum captured his elder brother Kamran and subjected the latter to brutal torture. A detailed account is left by Humayun's servant Jauhar and is quoted by Smith (p.20), which says, " .. (Humayun) had little concerns for his brother's sufferings .. One of the men was sitting on Kamran's knees. He was pulled out of the tent and a lancet was thrust into his eyes .. Some lemon juice and salt was put into his eyes .. After sometime he was put on horseback." One can imagine the cruelty and torture that Humayun was capable of inflicting on others when he subjected to his own brother to such atrocities. Humayun was also a slave to opium habit, engaged in excessive alcohol consumption and a lecherous degenarate when it came to women (Shelat, p.27). He is also known to have married a 14 year old Hamida Begum by force. The cruelties perpetrated by of Akbar's descendants (Jehangir, Shahjahan, Aurangzeb, etc.) are not entirely different from those of his ancestors. Having brought up in the company and under the guidance of a lineage of drug addicts, drunkards and sadists, it is rather anamalous that Akbar held such a gentle and noble character. Even assuming that he fancied nobility, it is amazing that Akbar let his comtemporaries and Generals, like Peer Mohammad, loot and rape the helpless citizenry that he was ruling! It would however be interesting to observe the incidents in Akbar's reign and evaluate his character.

Akbar's (Immoral) Character and Nature: Akbar possessed a inordinate lust for women, just like his ancestors and predecessors. One of Akbar's motives during his wars of aggression against various rulers was to appropriate their women, daughters and sisters. The Rajput women of Chittor prefered "Jauhar" (immolation) than to be captured and disrespectfully treated as servants and prostitutes in Akbar's harem. On his licentous relations with women, Smith refers to a contemporary Jesuits testimony (p.81) thus, "... Akbar habitually drank hard. The good father had boldly dared to reprove the emperor sharply for his licentous relations with women. Akbar instead of resenting the priests audacity, blushingly excused himself." Both drinking and enganging in debauched sexual activities was inherited by Akbar from his ancestors.

Fazl in Ain-i-Akbari (Blochmann,V.1,p.276), ".. His majesty has established a wine shop near the palace ... The prostitues of the realm collected at the shop could scarcely be counter, so large was their number .. The dancing girls used to be taken home by the courtiers. If any well known courtier wanted to have a virgin they should first have His Majesty's [Akbar's] permission. In the same way, boys prostituted themselves, and drunkeness and ignorance soon lead to bloodshed ... His Majesty [Akbar] himself called some of the prostitutes and asked them who had deprived them of their virginity?" This was the state of affairs during Akbar's rule, where alcoholism, sodomy, prostitution and murderous assaults were permitted by the king himself. The conditions of the civic life during Akbar's life is shocking!

Sodomy was a precious service of Akbar's own family. Babur, Akbar's grandfather, has given a lengthy description of this sodomic infatuation for a male sweetheart. Humayun was no different. Though perhaps Akbar did not engage in sodomy, he "allowed" it to be practiced by his servants, courtiers and sycophats. Abul Fazal in Ain-e-Akbari provides accounts of some such acts which are too disgusting to even mention. Such perverse gratification was prevelant during the Moghal rule, and in Akbar's times.

That Akbar remained monogamous throughout his life is indeed history falsified myth. Again quoting V.Smith (pp.47),".. Akbar, throughout his life, allowed himself ample latitude in the matter of wives and concubines!" and further, " Akbar had introduced a whole host of Hindu the daughters of eminent Hindu Rajah's into his harem." (pp.212). An account of how the Jaipur rulers were coerced into sending their daughters to the Mogul harem is found in Dr. Srivastava's book Akbar - The Mogul (Vol.1). Shelat notes (p.90)," (after the "Jauhar" that followed the killing of Rani Durgawati) the two women left alive, Kamalavati (sister of Rani Durgawati) and the daughter of the Raja of Purangad (daughter-in-law of the deceased queen) were sent to Agra to enter Akbar's harem." It should also be observed that adimittance into Akbar's harem was available mainly to virgins and others' were "disqualified". Inspite of such disgusting and lewd personal affairs, inducting women of abducted or killed Hindu warriors into his harem as slaves and prostitutes, it is bewildering that Akbar is hailed as a righteous and noble emperor.

The personality and nature of Akbar has been nicely summed up by the Editor of Father Monserrate's Commentarius. The editor's introduction states, "In the long line of Indian soverigns, the towering personalities of Ashoka and Akbar (because of his dread) stand high above the rest... Akbar's greed for conquest and glory and his lack of sincerity form a marked contrast to Ashoka's paternal rule, genuine self-control and spiritual ambition. Akbar's wars were those of a true descendent of Timur, and had all the gruesome associations which this fact implies."

"The old notion that Akbar's was a near approximation to Plato's philosopher king has been dissipated by modern resarches. His character with its mixture of ambition and cunning has now been laid bare. He has been rightly compared to a pike in a pond preying upon his weaker neighbours .. Akbar was unable to give up his polygamous habits, for no importance needs to be attached to the bazaar gossip of the time that he once intended to distribute his wives among his grandees."

Whole of India was reduced to a brothel during the Moghal rule and Akbar, one of the Emperors, is being glorified as one of the patrons of the vast brothel. The above instances may suffice to convince the impartial reader that Akbar's whole career was a saga of uninhibited licentiousness backed by the royal brute.
Akbar's Barbarites: Glancing at the events in the reign of Akbar, it is a compelling deduction that he was no less cruel a tyrant than any of his ancestors. With his trecherous nature and the unlimited power than he wielded over a vast region qualifies him to be one of the foremost tyrants and sadists in India's history, or perhaps, even world history.

Vincent Smith (p.50) says that in a privately executing Kamran's son [namely, Akbar's own cousin] at Gwalior in 1565, ".. Akbar set an evil example, initiated on a large scale by his descendents Shahjahan and Aurangzeb." This does not cause a serious alarm knowing the percious heritage of duplicity and trechery handed down to Akbar by his ancestors. Generations of martial races (Rajputs) were cut off by his (Akbar) sword ... he was long ranked with Shahbuddin and Alla (Allauddin) and other instruments of destruction, and with every just claim; and like these he constructed a Mumbar (a pulpit for islamic preachers) for the Koran from the altar of Eklingji (the deity of the Rajput warriors)." (Todd, p.259) Not only that he forcibly annihilated innumerable humans, he also had no respect for temples and deities and willingly indulged in destruction of such places of worship.

That Akbar refused to strike a helpless and injured prisoner seems to be utterly false. At an tender age of 14, Akbar slashed the neck of his Hindu adversary Hemu brought before him unconcious and bleeding. After the fateful battle of Panipat, the unconcious Hemu was brought before Akbar who smote Hemu on his neck with his scimitar, and in Akbar's presence, the bystanders also plunged their swords into the bleeding corpse. Hemu's head was sent to Kabul and his trunk was gibbeted at one of the gates of Delhi. After victorious forces pushing south from Panipat after that great victory (at Panipat), writes Smith (pp.29), "marched straight into Delhi, which opened its gates to Akbar, who made his entry in state. Agra was also passed into his possession. In accordance with the ghastly custom of the times, a tower was built with the heads of the slain. Immense treasures were taken with the family of Hemu whose aged father was executed." This "tower of heads" tradition and ceremony was religuously preserved by the "magnanimous" Akbar.

After the capture of Chittor, says Smith (p.64), ".. Akbar exasperated by the obstinate resistance offered to his arms, treated the town and garrison with merciless severity. The 8000 strong Rajput garrison having been zealously helped during the seige by 40,000 peasants, the emperor ordered a general massacre which resulted in the death of of 30,000 (even thought the struggle was over). Many were made prisoners." Such terrible was his humanitarian outlook as towards his defeated adverseries. L.M. Shelat writes more on this incident that (pp.105), "neither the temples nor the towers escaped the vandalism of the invaders". There were events where intolerant Akbar ordered the excision of one man's tongue, trampling opponents to death by elephants and other private or informal executions and assacinations. After a victorious battle at Ahemadabad, in accordance with the gruesome custom at the times, a pyramid was built with the heads of the rebels, more than 2000 in number. At one time, enraged on seeing a hapless lamplighter coiled up near his couch, Akbar order that the servant be shreded into thousand pieces! What else can one expect the barbaric and unscrupulous Akbar?

Akbar's reign of horrid cruelties includes the following incident which must be considered the jewel in the crown of horrid pastimes. Vincent Smith writes (pp.56) "An extraordinary incident which occured in April while the royal camp was at Thanesar, the famous Hindu place of pilgrimage to the north of Delhi, throws a rather unpleasant light on Akbar's character... The Sanyasins assembled at the holy tank were divided into two parties, called the Kurs and Puris. The leader of the latter complained to the King that that the Kurs had unjustly occupied the accustomed sitting place of the Puris who were thus debarred from collecting the pilgrims' alms." They were asked to decide the issue by mortal combat. They were drawn up on either side with their arms drawn. In the fight that ensued the combatants used swords, bows, arrows and stones. "Akbar seeing that the Puris were outnumbered gave a signal to some of his savage followers to help the weaker party." In this fight between the two Hindu sanyasin sects Akbar saw to it that both were ultimately annihilated by his own fierce soilders. The chronicler unctuously adds that Akbar was highly delighted with this sport. How can an emperor, so noble and great, can have a sadist mind that relishes and obtains "delight" by ordaining and watching two Hindu sanyansin sects being slaughtered?

Killing and massacring others' was regarded as a pastime and diversion by a bereaved Akbar. The chronicler Ferishta notes (Briggs, p.171), "Prince Murad Mirza falling dangerously ill (May 1599) was buried at Shapoor. The corpse was afterwards removed to Agra, and laid by the side of Humayun, the prince's grandfather. The kings grief for the death of his son increased his desire for the conquering the Deccan, as a means of diverting the mind." Could there exist a more sinister kind of sadism?

Akbar's cruelty towards the Hindu women kidnapped and shut up in his harem were stagerring and his much vaunted marraiges said to have been contracted for communal integration and harmony were nothing but outrageous kidnappings brought about with the force of arms. This is apparent from Akbar's marriage to Raja Bharmal's daughter that occured at Deosa "when people Deosa and other places on Akbar's route fled away on his approach." (Shrivastava, pp.63). Why would the people flee in terror if at all Akbar was "visiting" Raja Bharmal and that the marraige was congenial and in consent with the bride's party? Far from abolishing the practice of Sati, Akbar invited the Jesuit priests to watch the "considerble fun" and supporting it by his weighty judgement and explicit approbation. (Monserrate's Commentary, pp.61).

Many more horried facts on Akbar's rule can be added. Even the infamous tax, which supposedly was abolished by Akbar, was continually being collected in Akbar's reign. A number of persons were secretly executed on Akbar's orders and a list of such people is provided by Vincent Smith. Akbar's reign was nothing but terror, torture and tyranny for his subjects and courtiers as is obvious from the quoted events. There are numerous other occasions and recorded events from Akbar's life that personifies him as a devil incarnate, contrary to what has been propagated.

Akbar's Fanaticism: Akbar was born a muslim, lived like a muslim and died as a muslim; that too a very fanatic one. Histories have dubbed him as a true believer who accomplished a synthesis of the best principles of all religions. The infamous Jiziya tax, which is special tax exaction from the Hindus, was never abolished by Akbar. Time and time again different people had approached seeking exemption from Jiziya. Everytime the exemption was ostensibly issued, but never was actually implemented. Throughout Akbar's reign, temples used to razed to the ground or misappropriated as mosques and cows were slaughtered in them, as happened in the battle at Nagarkot. No symbol of Hindu origin and design was spared from the iconoclastic wrath of Akbar.

Xavier, a Jesuit in Akbar's court, gives a typical instance of Akbar's perfidy in making people drink water in which his feet had been washed. Xavier writes, says Smith (p.189), Akbar posed " as a Prophet, wishing it to be understood that he works miracles through healing the sick by means of the water in which he washed the feet." Badauni says that this [the above] special type of humiliation was reserved by Akbar only for Hindus. Says Badayuni, "... if other than Hindus came, and wished to become disciples at any sacrifice, His Majesty reproved them." Where was his broadminded and tolerant nature then?

Yet another Xavier's letter (MacLagan, p.57 and Du Jarric, p.90) states, "The Christian fathers got little opportunity of holding religious discussions with Akbar or influencing him in favour of Christianity ...Akbar silenced Xavier by telling him that the freedom accorded to him in preaching his religion was itself a great service." Akbar was not at all a tolerant of other religious faiths.

Akbar had filled both his hands with 50 gold coins when Badayuni expressed his strong desire to take part in a "holy war" (massacring Hindus) and "dye these black moustachois and beard in (hindu) blood through loyalty to Your Majesty's person" (sic). Akbar far from dispproving of Badayuni's despicable desire, gladly presented him with a decent premium.

The Hindus were treated as thirdclass citizens in Akbar's reign is evident from the Ain-i-Akbari. Abul Fazal writes, "... he [Husayn Khan, Akbar's governer at Lahore] ordered the Hindus as unbelievers to wear a patch (Tukra) near the shoulders, and thus got the nick name of Tukriya (patcher)." (Bochmann., p.403) The patch was obviously to mark the "unbelievers" out as pariahs for providing special degrading treatment.

The holy Hindu cities of Prayag and Banaras, writes Vincent Smith (p.58), were plundered by Akbar because their residents were rash enough to close their gates! No wonder Prayag of today has no ancient monuments -- whatever remain are a rubble! It is rather obvious that Akbar had no respect and reverance for cities considered holy by Hindus, let alone esteem for human life and property. Also, it is evident from this instance that Akbar's subjects were horrified and scared upon the arrival of their king into their city. If at all Akbar was so magnanimous, why then did not the people come forward and greet him?

Monserrate, a contemporary of Akbar, writes (p.27), "the religious zeal of the Musalmans has destroyed all the idol temples which used to be numerous. In place of Hindu temples, countless tombs and little shrines of wicked and worthless Musalmans have been erected in which these men are worshipped with vain superstition as though they were saints." Not only did the muslims destroy the idols, but usurped the existing temples and converted them into tombs of insignificant people.

Akbar has neither any love or compassion for Hindus as is apparent from the above examples. Hindus were openly despised and contemptously treated under Akbar's fanatical rule as under any other rule. Akbar was only one of the many links of the despotic and cruel Moghal rule in India, and enforced the tradition of his forefathers with sincerity and equal ruthlessness.

Akbar's (mal) Administration: Akbar was so penurious and retentive of money that .." he considered himself to be heir of all his subjects, and ruthlessly seized the property of every deceased whose family had to make a fresh start ... Akbar was a hard headed man of business, not a sentimental philanthropist, and his whole policy was directed principally to the aquisition of power and riches. All the arrangements about Jagirs, branding (horses) etc., were devised for the one purpose namely, the enhancement of the power, glory and riches of the crown." (Smith, p.263). The latter statement indicates what a marvellous and altruist administrator Akbar was!

Akbar's lawless and rapacious rule also led to horrible famines -- Delhi was devastated and the mortality was enormous. Gujrat, one of the richest provinces in India, suffered severly for 6 months in 1573-74. Smith writes, "The famine which began in 1595 and lasted three or four years until 1598 equalled in its horrors the accession year and excelled the visitation by reason of its longer duration. Inundation and epidemics occasionally marred Akbar's reign." And Akbar is said to have done nothing to ameliorate the sufferings of the masses, instead accumulated all the wealth he had amassed into forts and palaces.

Refering to the Gujarat famine, Dr. Shrivastava (p.169) writes, "... the famine was not caused by drought or the failure of seasonal rains, but was due to the destruction wrought by prolonged wars and rebellions, constant marching and counter-marching of troops, and killing men on a large scale, and the breakdown of admnistrative machinary and the economic system ... The mortality rate was so high that on an average 100 cart-loads of dead bodies were taken out for burial in the city of Ahemadabad alone .."

Smith asserts that epidemics and inundiation often marred Akbar's reign, and at the time of such distress, writes Badayuni (Blochmann, p.391), parents were allowed to sell their children. Utter lawlessness and stately permissions to carry out immoral activities seem to the norm during Akbar's reign. Deadly pestilence and frightful famine appeared on the scene from time to time and lasted for years together, due to Akbar's callous and inadequate administrative capacities.

Noble in character that Akbar was that his generals and courtiers, even including his son Jehangir, revolted against him. Interminable wars and unending rebellions were continuing somewhere or the other in his so-called peaceful reign. Dr. Shrivastava nicely summarizes (p.381) , "The vast empire hardly ever enjoyed complete immunity from some kind of disturbance and rebellion. Some chief or the other taking advantage of slackness of administration, lack of vigillance ... or the occurance of a natural calamity raised its head in revolt. It is tedious to recount cases of civil disturbance.". On an occasion of an accident, rumours spread about the seriousness of the injury and possibly the death of Akbar which caused revolts and rebellions in distant parts of the country, and many paraganas were plundered by turbulent people!

Had Akbar been do generous as he is often made out to be and his reign so just and kind, peace and contentment should have prevailed during his lifetime and upon his death, the subjects should have looked upon his children with devotion love and respect. However, due to nature of Akbar's rapacious rule, everyone from princes to paupers wished to overthrow Akbar.

The (usurped) Buildings: With constant famines, wars and revolts occuring the Akbar's era, where then did he get the time and money to construct buildings of magnificence and grandeur, like the Fort at Agra ? Akbar is said to have built several forts and palaces and founded many townships. However, as seen earlier, Akbar simply renamed pre-existing townships of Hindu origin and claimed to have been built by himself.

One such unfortunate township is that of Fatehpur Sikri. It has a massive defensive wall around it, enclosing redstone gateways and a majestic palace complex, explicitly in the Rajput style. It is the creation of these buildings and gateways that are accredited to Akbar. Fatehpur Sikri (or Fatehpur/Sikri) was an ancient independent principality before its occupation by the muslims. Testifying to this Todd says (p.240), " [Rana Sangram Singh] came to the Mewar throne in 1509 A.D. Eighty thousand horses, seven Rajas of the highest rank, nine Raos and 104 cheiftains, bearing the titles of Rawal and Rawut with 500 elephants follwed him into the field (against Babur). The princess of Marwar and Amber did him homage, and the Raos of Gwalior, Ajmer, *Sikri* ... served him as tributaries .." The above passage makes it clear that even during the reign of Akbar's grandfather Babur, Sikri was ruled by a "Rao", who owed allegiance to Rana Sangram Singh of Mewar. Another reference to Fatehpur Sikri is of the year 1405 (150 years before Akbar) when Ikbal Khan was killed and his head was sent to Fatehpur (E&D, p.40). Also it is stated (E&D, p.44) that Khizr Khan (the founder of Sayyad dynasty, 1500 A.D.) remained in *Fatehpur* and did not go to Delhi. Even Babur has stated that Agra and *Sikri* housed several palaces equally magnificent (E&D, p.223). These 15th century references will, for now, suffice to prove the existence of Fatehpur Sikri before even Akbar was born, and that the beautiful buildings were not built by Akbar.

The Red Fort of Agra, also originally of Rajput design and construction, was usurped by Akbar. However, an account says that Akbar demolished the fort in 1565, apparently for no reason, and constructed another in its place. Surprisingly, in 1566, Adham Khan was punished by being thrown down from the second storey of the royal apartments inside the fort! Keene (Handbook for Visitor's to Agra and Its Neighbourhood) quotes this rumour and casts a very pertinent doubt that is the fort was demolished in 1565, how is it possible for Akbar to stay there in 1566 and a man was flung down from the second story? Keene adds that even the foundation of the extensive fort could not have been complete within three years. Neither did Akbar demolish the fort, nor did he rebuild an entire structure. He simply comandeered the fort from its original inhabitants, and claimed to have been built by him.

Similarly, the palaces and mansions in Ajmer, Allahabad, Manoharpur and other townships were simply usurped by Akbar. He never ordered engineers and architects to build to build magnificent buildings. Testifying to this, Monserrate in his Commentarius (p.16) remarks, ".. musalmans whose nature is indeed that of barbarians, take no interest in such things (erecting massive and ornate buildings and townships). Their chronicles being scanty and unreliable and full of old wives tales..." The fraudulent claims that Akbar designed and built these monuments are fabricated stories written by muslim chroniclers toadying for Akbar's favours.
Summary: Akbar's life has been full of acts of cruelties, barbaric behaviour, lust for women and wine. Considering the background in which Akbar was brought up and the environment in which he lived, it was indeed a surprise that he would develop qualities of compassion and love. Even assuming that such miracles can occur, unfortunately, Akbar's reign and state of administration contradict such an assumption and one is compelled to conclude that Akbar was no better a monarch than his forefathers. 

Apparently from what was described above, Akbar has been given unecessary credit of being tolerant, secular and an altruist king. His sycophantic courtiers, including the court chroniclers, alloted to him all the praises he desired. Upon some inspection, the nine-gem story of Akbar's court becomes a sheer invention of court flatterers, who sought Akbar's favour for self-aggrandizement. Akbar's recalcitrance and callousless in the matters of caring for his subjects and domain, led to untold misery in the form of famines and pestilence. Wars, revolts and rebellions constantly erupted concluding is mass mayhem and killings. 

There was no tranquility nor peace in Akbar's reign, let alone material and spiritual prosperity. That an avaricious miser Akbar was, it is rather unbelievable for him to have spent on creating expensive buildings and mansions. He was no better than other muslim monarchs, constantly on the prey to usurp power and pelf by whatever means they could. Morality and humanitarian principles took a back seat to self aggrandizement and lechery. Even after exercising numerous abductions, kidnappings, murders Akbar have been refered to as noble, compassionate and great. Even though religious fanatism never decreased in his reign, nay, was sponsored by Akbar himself, he has been termed as a secular, broadminded person. Such blunders of a serious magnitude have been committed by historians reconstructing and writing accounts on Indian history.

It may be worthwhile to research and present the "true" story of Akbar exposing to the world the true nature of Akbar and his personality. The Moghal rule in India was indeed very ruthless and full of difficult times for the people and the country; truly a "dark" age.


References:
Smith, V., "Akbar, The Great Mogul," 2nd Edition, S.Chand and Co., Delhi, 1958.
Todd, James.,"Annals and Antiquities of Rajasthan," 2 volumes, Routledge and Kegan Paul Ltd., London, 1957.
Shelat J.M, "Akbar," Bharatiya Vidya Bhawan, 1964, Bombay.
Blochmann, H., "Ain-e-Akbari," translation of Abul Fazal's Persian text, 2nd Edition, Bibliotheca Indica Series, published by the Royal Asiatic Society of Bengal.
Briggs, John, "History of Mahomedan Power in India (till the year 1612 A.D)," Vol.2, Translated from the original Persian of Mahomad bin Ferishta, S. Dey Publication, Calcutta, 1966.
Shrivastava, A.L., "Akbar the Great," Vol.1, Shiv Lal Agarwal and Co., Agra.
Monserrate S.J., "The Commentary," translated from original Latin by J.S. Hoyland, annotated by S.Banerjee, Humphrey Milford, Oxford Univ. Press, London, 1922.
Blochmann H., "Ain-i-Akbari" edited by D.C Phillot, Calcutta, 1927.
Elliot and Dowson," Tuzak-i-Babari", Vol.4..

Posted by SumanSpeaks at 11:23 

Friday, September 9, 2011

हिन्दी.हिन्दू.हिन्दुस्तान: रामदेव हमारे लिए एक खतरा : स्विस बेंक "रामदेव इफेक्ट "

हिन्दी.हिन्दू.हिन्दुस्तान: रामदेव हमारे लिए एक खतरा : स्विस बेंक: स्विस बैंक एसोसिएशन और स्विस सरकार ने बताया है की स्विस बैंको में जमा धन में पन्द्रह लाख करोड डॉलर की भयंकर कमी आयी है .. और स्विस इको...

स्विस बैंक एसोसिएशन और स्विस सरकार ने बताया है की स्विस बैंको में जमा धन में पन्द्रह लाख करोड डॉलर की भयंकर कमी आयी है .. और स्विस इकोनोमी को खतरा पैदा हो गया है .. वहा के सारे अखबारों और टीवी डिबेट में इसे "रामदेव इफेक्ट " कहा जा रहा है .

 स्विस बैंको में सबसे ज्यादा काला धन भारत से जमा होता है फिर चीन और रूस का नम्बर आता है .. बाबा रामदेव के अभियान से प्रभावित होकर चीन और रूस में भी काले धन के वापस लेन की जोरदार मुहीम चल रही है. चीन सरकार अरब देशो में हुई क्रांति से डरकर तुरंत ही एक कानून बना कर स्विस सरकार से सारा ब्योरा माँगा है और काले धन विदेश में जमा करने वालो को मृतुदंड देने की क़ानूनी बदलाव किया है, रूस में भी पिछले कई दिनों से लोग काले धन के खिलाफ लेनिन स्क्वायर पर प्रदर्शन कर रहे थे आखिरकार रुसी सरकार ने भी २ महीने में सारे काले धन को वापस लेन का देश की जनता को लिखित आश्वाशन दिया है .. रूस के सामाजिक कार्यकर्ता और रूस में काले धन के खिलाफ आन्दोलन चला रहे बदिमिर इलिनोइच ने बाबा रामदेव को प्रेरणाश्रोत मानकर अपना आन्दोलन चलाया ..

स्विटरज़रलैंड के लगभग सभी अखबारों जैसे स्विस टुडे, स्विस इलेस्ट्रेटेड, और टीवी चनेलो ने बाबा रामदेव को एक "खलनायक " के रूप में बता रहे है . इधर भारत में भी कांग्रेस पार्टी और सरकार उपरी मन से चाहे जो कुछ भी कहे लेकिन उसे भी अब जनता के जागरूक होने का डर सताने लगा है . कांग्रेस इस देश की टीवी चनेलो और अखबारों को तो खरीद सकती है लेकिन भारत में तेजी से उभर रही न्यू मीडिया [ वेब पोर्टल , फेसबुक , ट्विटर ] पर चाहकर भी वो प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती .. एक सर्वे में पाया गया है की इन्टरनेट पर कांग्रेस के खिलाफ जोरदार अभियान चल रहा है और ये अभियान कोई पार्टी नहीं चला रही है बल्कि इस देश के जागरूक और शिछित युवा चला रहे है जिनका किसी भी राजनितिक पार्टी से कोई लेना देना नहीं है ..

हिन्दी.हिन्दू.हिन्दुस्तान: ऐसा था एतिहासिक टीपू सुल्तान

हिन्दी.हिन्दू.हिन्दुस्तान: ऐसा था एतिहासिक टीपू सुल्तान: हैदर अली की म्रत्यु के बाद उसका पुत्र टीपू सुल्तान मैसूर की गद्दी पर बैठा। गद्दी पर बैठते ही टीपू ने मैसूर को मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया। म...

ऐसा था एतिहासिक टीपू सुल्तान

हैदर अली की म्रत्यु के बाद उसका पुत्र टीपू सुल्तान मैसूर की गद्दी पर बैठा। गद्दी पर बैठते ही टीपू ने मैसूर को मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया। मुस्लिम सुल्तानों की परम्परा के अनुसार टीपू ने एक आम दरबार में घोषणा की ---"मै सभी काफिरों को मुस्लमान बनाकर रहूंगा। "तुंरत ही उसने सभी हिन्दुओं को फरमान भी जारी कर दिया.उसने मैसूर के गाव- गाँव के मुस्लिम अधिकारियों के पास लिखित सूचना भिजवादी कि, "सभी हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षा दो। जो स्वेच्छा से मुसलमान न बने उसे बलपूर्वक मुसलमान बनाओ और जो पुरूष विरोध करे, उनका कत्ल करवा दो.उनकी स्त्रिओं को पकडकर उन्हें दासी बनाकर मुसलमानों में बाँट दो। "
इस्लामीकरण का यह तांडव टीपू ने इतनी तेजी से चलाया कि , पूरे हिंदू समाज में त्राहि त्राहि मच गई.इस्लामिक दानवों से बचने का कोई उपाय न देखकर धर्म रक्षा के विचार से हजारों हिंदू स्त्री पुरुषों ने अपने बच्चों सहित तुंगभद्रा आदि नदिओं में कूद कर जान दे दी। हजारों ने अग्नि में प्रवेश कर अपनी जान दे दी ,किंतु धर्म त्यागना स्वीकार नही किया।

टीपू सुलतान को हमारे इतिहास में एक प्रजावत्सल राजा के रूप में दर्शाया गया है।टीपू ने अपने राज्य में लगभग ५ लाख हिन्दुओ को जबरन मुस्लमान बनाया। लाखों की संख्या में कत्ल कराये। कुछ एतिहासिक तथ्य मेरे पास उपलब्ध जिनसे टीपू के दानवी ह्रदय का पता चलता है...............

टीपू के शब्दों में "यदि सारी दुनिया भी मुझे मिल जाए,तब भी में हिंदू मंदिरों को नष्ट करने से नही रुकुंगा."(फ्रीडम स्ट्रगल इन केरल)

"दी मैसूर गजेतिअर" में लिखा है"टीपू ने लगभग १००० मंदिरों का ध्वस्त किया। २२ मार्च १७२७ को टीपू ने अपने एक सेनानायक अब्दुल कादिर को एक पत्र likha ki,"१२००० से अधिक हिंदू मुस्लमान बना दिए गए।"

१४ दिसम्बर १७९० को अपने सेनानायकों को पात्र लिखा की,"में तुम्हारे पास मीर हुसैन के साथ दो अनुयाई भेज रहा हूँ उनके साथ तुम सभी हिन्दुओं को बंदी बना लेना और २० वर्ष से कम आयु वालों को कारागार में रख लेना और शेष सभी को पेड़ से लटकाकर वध कर देना"

टीपू ने अपनी तलवार पर भी खुदवाया था ,"मेरे मालिक मेरी सहायता कर कि, में संसार से काफिरों (गैर मुसलमान) को समाप्त कर दूँ"

ऐसे कितने और ऐतिहासिक तथ्य टीपू सुलतान को एक मतान्ध ,निर्दयी ,हिन्दुओं का संहारक साबित करते हैं क्या ये हिन्दू समाज के साथ अन्याय नही है कि, हिन्दुओं के हत्यारे को हिन्दू समाज के सामने ही एक वीर देशभक्त राजा बताया जाता है, अगर टीपू जैसे हत्यारे को भारत का आदर्श शासक बताया जायेगा तब तो सभी इस्लामिक आतंकवादी भारतीय इतिहास के ऐतिहासिक महान पुरुष बनेगे। वाह रे वाह भारत का धर्मनिरपेक्ष इतिहास।

प्रस्तुतकर्ता Naveen Tyagi पर ३:३६ पूर्वाह्न

हिन्दी.हिन्दू.हिन्दुस्तान: सनातन धर्म का रक्षक महान सम्राट पुष्यमित्र शुंग

हिन्दी.हिन्दू.हिन्दुस्तान: सनातन धर्म का रक्षक महान सम्राट पुष्यमित्र शुंग: मोर्य वंश के महान सम्राट चन्द्रगुप्त के पोत्र महान अशोक (?) ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक अगर राजपाठ छोड़कर बौद्ध भिक...
सनातन धर्म का रक्षक महान सम्राट पुष्यमित्र शुंग

मोर्य वंश के महान सम्राट चन्द्रगुप्त के पोत्र महान अशोक (?) ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक अगर राजपाठ छोड़कर बौद्ध भिक्षु बनकर धर्म प्रचार में लगता तब वह वास्तव में महान होता । परन्तु अशोक ने एक बौध सम्राट के रूप में लग भाग २० वर्ष तक शासन किया। अहिंसा का पथ अपनाते हुए उसने पूरे शासन तंत्र को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में लगा दिया। अत्यधिक अहिंसा के प्रसार से भारत की वीर भूमि बौद्ध भिक्षुओ व बौद्ध मठों का गढ़ बन गई थी। उससे भी आगे जब मोर्य वंश का नौवा अन्तिम सम्राट व्रहद्रथ मगध की गद्दी पर बैठा ,तब उस समय तक आज का अफगानिस्तान, पंजाब व लगभग पूरा उत्तरी भारत बौद्ध बन चुका था । जब सिकंदर व सैल्युकस जैसे वीर भारत के वीरों से अपना मान मर्दन करा चुके थे, तब उसके लगभग ९० वर्ष पश्चात् जब भारत से बौद्ध धर्म की अहिंसात्मक निति के कारण वीर वृत्ति का लगभग ह्रास हो चुका था, ग्रीकों ने सिन्धु नदी को पार करने का साहस दिखा दिया।
सम्राट व्रहद्रथ के शासनकाल में ग्रीक शासक मिनिंदर जिसको बौद्ध साहित्य में मिलिंद कहा गया है ,ने भारत वर्ष पर आक्रमण की योजना बनाई। मिनिंदर ने सबसे पहले बौद्ध धर्म के धर्म गुरुओं से संपर्क साधा,और उनसे कहा कि अगर आप भारत विजय में मेरा साथ दें तो में भारत विजय के पश्चात् में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लूँगा। बौद्ध गुरुओं ने राष्ट्र द्रोह किया तथा भारत पर आक्रमण के लिए एक विदेशी शासक का साथ दिया।
सीमा पर स्थित बौद्ध मठ राष्ट्रद्रोह के अड्डे बन गए। बोद्ध भिक्षुओ का वेश धरकर मिनिंदर के सैनिक मठों में आकर रहने लगे। हजारों मठों में सैनिकों के साथ साथ हथियार भी छुपा दिए गए।
दूसरी तरफ़ सम्राट व्रहद्रथ की सेना का एक वीर सैनिक पुष्यमित्र शुंग अपनी वीरता व साहस के कारण मगध कि सेना का सेनापति बन चुका था । बौद्ध मठों में विदेशी सैनिको का आगमन उसकी नजरों से नही छुपा । पुष्यमित्र ने सम्राट से मठों कि तलाशी की आज्ञा मांगी। परंतु बौद्ध सम्राट वृहद्रथ ने मना कर दिया।किंतु राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत प्रोत शुंग , सम्राट की आज्ञा का उल्लंघन करके बौद्ध मठों की तलाशी लेने पहुँच गया। मठों में स्थित सभी विदेशी सैनिको को पकड़ लिया गया,तथा उनको यमलोक पहुँचा दिया गया,और उनके हथियार कब्जे में कर लिए गए। राष्ट्रद्रोही बौद्धों को भी ग्रिफ्तार कर लिया गया। परन्तु वृहद्रथ को यह बात अच्छी नही लगी।
पुष्यमित्र जब मगध वापस आया तब उस समय सम्राट सैनिक परेड की जाँच कर रहा था। सैनिक परेड के स्थान पर hi सम्राट व पुष्यमित्र शुंग के बीच बौद्ध मठों को लेकर कहासुनी हो गई।सम्राट वृहद्रथ ने पुष्यमित्र पर हमला करना चाहा परंतु पुष्यमित्र ने पलटवार करते हुए सम्राट का वद्ध कर दिया। वैदिक सैनिको ने पुष्यमित्र का साथ दिया तथा पुष्यमित्र को मगध का सम्राट घोषित कर दिया।
सबसे पहले मगध के नए सम्राट पुष्यमित्र ने राज्य प्रबंध को प्रभावी बनाया, तथा एक सुगठित सेना का संगठन किया। पुष्यमित्र ने अपनी सेना के साथ भारत के मध्य तक चढ़ आए मिनिंदर पर आक्रमण कर दिया। भारतीय वीर सेना के सामने ग्रीक सैनिको की एक न चली। मिनिंदर की सेना पीछे हटती चली गई । पुष्यमित्र शुंग ने पिछले सम्राटों की तरह कोई गलती नही की तथा ग्रीक सेना का पीछा करते हुए उसे सिन्धु पार धकेल दिया। इसके पश्चात् ग्रीक कभी भी भारत पर आक्रमण नही कर पाये। सम्राट पुष्य मित्र ने सिकंदर के समय से ही भारत वर्ष को परेशानी में डालने वाले ग्रीको का समूल नाश ही कर दिया। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण वैदिक सभ्यता का जो ह्रास हुआ,पुन:ऋषिओं के आशीर्वाद से जाग्रत हुआ। डर से बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले पुन: वैदिक धर्म में लौट आए। कुछ बौद्ध ग्रंथों में लिखा है की पुष्यमित्र ने बौद्दों को सताया .किंतु यह पूरा सत्य नही है। सम्राट ने उन राष्ट्रद्रोही बौद्धों को सजा दी ,जो उस समय ग्रीक शासकों का साथ दे रहे थे।
पुष्यमित्र ने जो वैदिक धर्म की पताका फहराई उसी के आधार को सम्राट विक्र्मद्वित्य व आगे चलकर गुप्त साम्रराज्य ने इस धर्म के ज्ञान को पूरे विश्व में फैलाया। .................................लेख जारी है।

हिन्दी.हिन्दू.हिन्दुस्तान: चित्तौडग़ढ़ में हुआ था विश्व का सबसे पहला कत्ले-आम...

हिन्दी.हिन्दू.हिन्दुस्तान: चित्तौडग़ढ़ में हुआ था विश्व का सबसे पहला कत्ले-आम...: ( रामदास सोनी) at hindugatha.blogspot.com घमासान युद्ध आरंभ हो चुका था। दो रात और एक दिन तो युद्ध के कारण दोनों पक्षों के सैनिक खाना-सोना त...


चित्तौडग़ढ़ में हुआ था विश्व का सबसे पहला कत्ले-आम - PART -2
( रामदास सोनी) at hindugatha.blogspot.com


घमासान युद्ध आरंभ हो चुका था। दो रात और एक दिन तो युद्ध के कारण दोनों पक्षों केसैनिक खाना-सोना तक भूल गए थे। किले के नागरिकों से राजपूतों को भरपूर सहायता मिल रही थी। वे अपने घरों से ज्वलनशील सामग्री ला लाकर मोर्चों पर पहुँचा रहे थे। शस्त्रों का अनवरत निर्माण कर रहे थे। प्राचीरों पर पत्थरों का ढेर लगा था, यदा कदा स्वयं भी शाही सेना पर पथराव के द्वारा प्रत्यक्ष युद्ध में भाग ले रहे । राजपूताने के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब युद्ध विधा से अपरिचत नागरिकों, स्त्रियों और बालकों तक ने मातृभूमि की रक्षा के लिये युद्ध में भाग लिया था। चारों ओर रण मद छाया था।

अपनी कमज़ोर स्थिति के बावज़ूद उनका उत्साह भंग नहीं हो रहा था। नागरिकों का मनोबल देख सैनिकों व सरदारों का हौसला भी दुगुना हुआ जाता था। यह देख रनिवासों की राजपूतानियाँ भी घूँघट उलट युद्ध में आ कूदीं। उनका मनोबल देख कर किसी भी सरदार कोउन्हें रोकने का साहस नहीं हुआ। जयमल्ल द्वारा उन्हें महलों में रह कर ही युद्ध का परिणाम देखने की बात सुनते ही पत्ता चूंडावत की माँ सज्जन बाई सोनगरी बिफर उठी। सिंहनी की गर्जना के साथ उन्होंने पूछाग् क्या यह हमारी मातृभूमि नहीं है? क्या इसकी रक्षा की जिम्मेदारी हमारी नहीं है? क्या इससे पूर्व इसी किले में जवाहर बाईके नेतृत्व में राजपूत स्त्रियों ने युद्ध नहीं लडा.? यदि यह सच है तो हमें युद्ध में भाग लेने से कैसे रोका जा सकता है? इसके बाद किसीने उन्हें रोकने का साहस नहीं किया। युद्ध में अकबर चकिया नामक हाथी पर सवार हो कर न केवल सभी मोर्चों को सँभालता था, अपितु सैनिकों के साथ खड़ा हो बंदूकें भी चलाने लगता था। लाखोटा दरवाजे के पास मोर्चे के निरीक्षण के समय किले से आई गोली उसके कान के पास से निकल गई। अकबर ने फुर्ती से दीवार की आड़ ले अपनी जान बचाई। फिर उसने बन्दूक लेकर तरकश की तरफ गोली चलाईग, जिससे किले के बन्दूकचियों का सरदार इस्माईल खाँ मारा गया. कालपी से लाए एक हजार बक्सरिया मुसलमानों की सेना इस्माईल खाँ के नेतृत्व में राजपूतों की ओर से लड़ रही थी। इस सेना के कुशल बन्दूकचियों ने शाही सेना के सैंकड़ों सैनिकों को मारा था।

घमासान युद्ध के दौरान अकबर को एक तीरकश से हजारमेखी सिलह पहने एक सरदार दिखाई दिया। उसे महत्वपूर्ण सरदार जान अकबर ने अपनी संग्राम नामक बंदूक से गोली चला दी। गोली जयमल्ल के घुटने में लगी। पैर टूट जाने पर उसने सभी सरदारों को एकत्र कर मंत्रणा की। किले की दीवारें कई जगह से टूट-फूट जाने के अतिरिक्त भारी संख्या में सैनिक मारे जा चुके थे। उधर कड़ी घेराबंदी के कारण किले में खाद्य सामग्री का भी अभाव हो चला था। ऐसे में रनिवासों में शेष रही राजपूत स्त्रियों, कन्याओं और बालकों को जौहर की प्रचण्ड ज्वालाओं में भस्म करने के बाद,शेष राजपूतों को केसरिया बाना धारण कर शत्रुओं पर टूट पडऩे का अंतिम निर्णय ले लिया गया।

25 फरवरी 1568 को अर्धरात्रि में हज़ारों राजपूत वीरांगनाओं ने भीमलत कुण्ड में स्नान कर सौभाग्य चिन्ह धारण किये। हर हर महा देव के अनवरत जयघोषों और ढोल-नगाड़ों की ध्वनियों के बीच समिधेश्वर महादेव के दर्शन कर वे जौहर स्थल पर एकत्रित हो गईं। इनका नेतृत्व जयमल्ल राठौड़ और पत्ता चूण्डावत की पत्नियाँ कर रही थीं। समिधेश्वर महादेव और भीमलत के बीच विशाल मैदान में लकडिय़ों का विशाल ढेर एकत्रित था। ब्रह्म मुहूर्त में वेद मंत्र ध्वनियों के साथ अग्नि प्रज्वलित की गई । केसरिया वस्त्र पहने राजपूत रक्तिम नेत्रों से अपनी पत्नियों, बालक पुत्रों तथा पुत्रियों को अन्तिम विदा दे रहे थे। विकराल अग्नि शिखाएं आकाश स्पर्श की स्पर्धा में लपलपाने लगीं। मातृभूमि को अन्तिम प्रणाम कर पत्ता की बड़ी रानी जीवाबाई सोलंकी ने पति की ओर देखा, आँखों से ही पति को अन्तिम प्रणाम कर, हर हर महादेव के गगनभेदी जयघोषों के बीच वह अग्निकुण्ड में कूद गई। इसके साथ ही पत्ता की अन्य रानियाँ मदालसा बाई कछवाही, भगवती बाई चहुवान, पद्मावती झाली,रतन बाई राठौड, बालेसा बाई चहुवान, आसाबाई बागड़ेची अपने दो पुत्रों तथा पाँच पुत्रियों के साथ लपलपाती ज्वाला में समा गई। कुछ वर्ष पूर्व गुजरात के बादशाह बहादुर शाह के चित्तौड़ आक्रमण में अपने पति को न्यौछावर करने वाली पत्ता की माँ सज्जन बाई सोनगरी ने पुत्र को केसरिया तिलक लगा कर जौहर किया। विजयी मुगलों सेअपना सतीत्व और बच्चों को मुसलमान बनाने से बचाने के लिये हज़ारों राजपूत वीरांगनाओं ने पत्ता, साहिब खान, ईसरदास की हवेलियों के पास धधक रही चिताओं में अग्निस्नान कर दूसरे लोक में प्रस्थान किया। अंधकार में धधकती ज्वालाएं मीलों दूर तक दिखाई दे रहीथी। आशंकित अकबर को आम्बेर के राजा भगवान दास ने बताया कि अपने स्त्री-बच्चों को अग्नि की भेंट कर महाकाल बने राजपूतों का अन्तिम ओर प्रचण्ड आक्रमण होने वाला है। केसरिया बाना धारण करने के बाद राजपूत स्वयं महाकाल बन जाता है। सुन कर अकबर ने समय नष्ट नहीं किया और फौरन सेना की व्यूह रचना सुदृढ़ कर,राजपूती आक्रमण की प्रतीक्षा करने लगा।

भोर की प्रथम किरण के साथ किले के द्वार खुल गए। हर हर महादेव के जयघोषों के साथ रण बांकुरे राजपूत मुगल सेना पर टूट पड़े। अकबर की गोली से घुटना टूट जाने के कारण जयमल्ल को घोड़े पर बैठने में असमर्थ देख उसके भाई कल्ला राठौड़ ने अपने कन्धें पर बिठा लिया। दोनों भाई तलवार चलाते हुए शाही सेना में घुस गए। महाकाल बने दोनों भाई दो घड़ी घण्टे तक युद्ध करने के बाद हनुमान पोल और भैरव पोल के बीच मारे गए। उधर डोडिया सांडा भी गम्भीरी नदी के पश्चिम में घमासान युद्ध करते हुए मारा गया। राजपूतों के प्रचण्ड आक्रमण का सामना करने के लिये अकबर ने पचास प्रशिक्षित हाथियों की सूंडों में दुधारे खांडे पकड़ा कर आगे बढ़ाया। इनके पीछे तीन सौ हाथियों की एक और रक्षा पंक्ति सूंडों में दुधारे खांडे पकड़ आगे बढ़ी। इनमें मधुकर, जांगिया, सबदलिया,कदीरा आदि कई विख्यात और कई युद्धों में आजमाये गजराज भी शामिल थे।

अकबर स्वयं मधुकर पर सवार होकर युद्ध संचालन कर रहा था। इनके मुकाबले राजपूत सरदार घोड़ों पर शेष सब पैदल थे। लेकिन शौर्य साधनों का मोहताज नहीं होता। एक राजपूत ने उछल कर वार किया तो अजमत खां के हाथी की सूंड कट कर दूर जा गिरी। घबराया हाथी अपनी ही सेना को कुचलता हुआ भागा। भागते हाथी से गिर कर अजमत खां ने भी दम तोड़ दिया। इसी प्रकार सबदलिया हाथी ने भी सूंड कट जाने पर अपनी ही सेना के पचासों सैनिकों को कुचल डाला। राजपूतों के कड़े प्रतिरोध के बाद भी शाही सेना हाथियों और बंदूकों के बल पर धीरे-धीरे किले में प्रवेश करती जा रही थी। यह देख राजपूतों की ओर से लड़ रहे बक्सरिया मुसलमानों की बन्दूक सेना ने भाग निकलने में ही कुशल समझी। वे अपनी स्त्रियों और बच्चों को कैदियों की तरह घेर कर शाही सेना के बीच से निकले। उन्हें अपना सैनिक समझ शाही सेना ने रोक-टोक नहीं की। सूरजपोल पर रावत साईं दास बहादुरी के साथ लड़ते हुए मारा गया। उसकी मदद को पहुँचे राजराणा जैता सज्जावत और राजराणा सुल्तान आसावत भी वहीं काम आ गए। समिधेश्वर महादेव मन्दिर के पास और रामपोल पर पत्ता चूंडावत के नेतृत्व में युद्ध हो रहा था। रणबांकुरा पत्ता चपलता के पूर्वक घोड़ा दौड़ाता हुआ हाथियों की सूंडे काट रहा था। रक्त के धारे बहाते ये शुण्ड विहीन गजराज अपनी ही सेना को कुचलते हुए भाग रहे थे।

एक गजराज की सूंड में पकड़े खांडे से घोड़े का पैर कट जाने पर पत्ता जमीन पर कूद पड़ा और पैदल ही मारकाट करता हुआ गम्भीर रूप से घायल हो गया। महावत उसे महत्वपूर्ण सरदार समझ जिन्दा गिरफ्तार करने के लिये हाथी की सूंड में लपेट अकबर की ओर चला। पत्ता की वीरता से प्रभावित बादशाह द्वारा प्राण बचाने के प्रयास करने से पूर्व ही उसने दम तोड़ दिया। किले के चप्पे-चप्पे पर हुए घमासान युद्ध में रणबांकुरे राजपूत तिल-तिल कट मरे। एक ओर जौहर की चिताएं अब भी धधक रही थीं, दूसरी ओर रामपोल से समिधेश्वर तक की जमीन लाशों से ढँक गई थी। किले पर शाही झंडा फहराने के बाद अकबर के चेहरे पर विजय का उल्लास अभी ठीक से फैल भी न सका था कि एक अप्रत्याशित दृश्य ने स्तंभित कर दिया, वह समझ नहीं पा रहा था कि यह दृश्य वास्तव में हकीकत है या फिर कोई सपना देख रहा है। ऐसा दृश्य किसी युद्ध में देखना तो दूर सुना तक न था। युद्ध में आम नागरिक सेना की सहायता तो करते हैं किन्तु स्वयं मैदान में नहीं उतरते। लेकिन यहाँ तो अघट ही घट रहा था। किले की घेराबंदी से पूर्व आस-पास के गाँवों से किले में आ गए ग्रामीणों ने किले के निवासियों के साथ मिल कर शाही सेना पर हल्ला बोल दिया था। इनके पास न शस्त्र थे और न ही लडऩे का कौशल। जिसके हाथ जो आया उसी से सैनिकों को मारने लगा। ब्राह्मणों ने वेदपाठ छोड़ लाठियाँ उठा लीं।

वैश्य-वणिकों ने तौलने के बांटों से ही कइयों के सर फोड़ डाले। भील, लोहार, धोबी,रंगरेज, जुलाहे, मोची, राज मिस्त्री कोई भी तो पीछे न रहा। लाठी, डंडा, गोफन, पत्थर आदि ही उनके अस्त्र थे। यह विश्व का अनूठा युद्ध था। जहाँ प्रशिक्षित अस्त्र-शस्त्र से सज्जित सेना से शस्त्रविहीन देहाती भिड़ रहे थे।

मुश्किल से हासिल विजय में खलल पड़ता देख तैमूर के वंशज अकबर की आँखों में खून उतर आया। मातृभूमि के प्रति प्रेम से उत्पन्न इस छोटे से प्रतिरोध को बिना खून-खराबे के शान्त करना आसान था किन्तु अकबर ने नृशंस निर्णय लिया। शाही सेना पर हमले के अपराध में उसने कत्ल-ए-आम का आदेश दे दिया। विजय के नशे में चूर मुगल निहत्थे नागरिकों पर टूट पड़े। चारों ओर कोहराम मच गया। खूंखार सैनिकों के सामने जो पड़ा, नृशंसता पूर्वक कत्ल कर दिया गया। स्त्रियों और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। चित्तौड़ की आवासीय गलियाँ लाशों से भर गईं। मध्यान्ह से तीसरे प्रहर तक चला कत्ल-ए-आम अन्तिम व्यक्ति को भी तलवार की भेंट चढाने के बाद ही बन्द हुआ। विश्व के इस सबसे बड़े हत्याकाण्ड में चालीस हज़ार से अधिक नागरिक स्त्री,पुरूष, बालक मारे गए किन्तु इस युद्ध में मारे गए राजपूतों और जौहर की स्त्रियों को भी शामिल करने पर यह संख्या सत्तर हज़ार से अधिक हो जाती है। जबकि 12 मार्च1739 को नादिरशाह द्वारा दिल्ली में किये कत्ल-ए-आम् में लगभग तीस हज़ार लोग दरिन्दगी की भेंट चढ़े थे। यह महान कहे जाने वाले अकबर की नृसंसता का घृणित प्रदर्शन ही था कि अपनी सफलता का आकलन करने के लिये उसने मारे गए लोंगों के यज्ञोपवीतों को तुलवाया, उनका वजन 7411निकला।

उन दिनों मेवाड़ी मन चार सेर का होता था। इससे है हत्या की भयावहता का अनुमान हो जाता है। कार्थाज़ वालों ने भी केना के युद्ध में मारे गए रोमनों की अगूठियाँ तुलवा कर अपनी सफलता का परिणाम आंका था। चित्तौड़ दुर्ग के निवासियों ने ही नहीं वहाँ के भवनों, मन्दिरों, महलों ने भी अकबरी प्रकोप झेला था। अनेकों भवनों, मन्दिरों, महलों को नष्ट कर ख्वाजा अब्दुल मजीद आसिफ खाँ को किले का शासन सौंप कर अकबर आगरा लौटा था। जयमल और पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर उसने आगरा के किले में इनकी पत्थर की मूर्तियाँ लगवा कर इनके शौर्य का सम्मान अवश्य किया था।

( रामदास सोनी) at hindugatha.blogspot.com

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